Tuesday, January 12, 2010

इक बहन की ओर से

वो कहता था : जीना नहीं चाहता
डॉक्टर कहते थे : इलाज हो नहीं सकता
हम सब -उसके रिश्तेदार- भी परेशां थे
जब उसको बुलावा आ गया वक़्त का
वो नया साल ( २०१० ) मनाने
हम सबको इस पुरानी दुनिया में छोड़कर
अपने निजधाम चला गया
( यह दुनिया तो आखिर सराय ही है न मुसाफिरों के लिए)
बिछुड़ने का दुःख तो होगा ही
अपने उस प्यारे भैया का -
जिसे मैं अब देख नहीं सकती
जिसे मैं अब सुन नहीं सकती
जिसे मैं सुना नहीं सकती ( अपना दर्द )
जिसे मैं में छू नहीं सकती
वो जिसके संग बीता था बचपन
साथ की थी पढाई
शरारतें, शिकायतें
रूठना और मनाना
और कभी-कभार लड़ाई भी
वो समझता था मेरा मन
आखिर भाई था मेरा -
सपनों में आज रात भी आया था

4 comments:

  1. kya kavita hai bhai manana padega
    shabdon main kai bhavnaon ko vyakt kiya hai aapne

    krapya mera blog visit karein aur tippaniyon ke roop main mera margdarshan karein
    dhanyavaad
    aapka
    devey
    deveyrathore.blogspot.com
    kahani1999.blogspot.com

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  2. मार्मिक///

    समय और नियति के आगे हम सब हारे हैं.

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