Monday, October 18, 2010

पहेली सुलझ गई

झील के किनारे खड़ा
डूबने की सोचता हुआ
जैसे ही वो थोड़ा नीचे उतरा
इक नन्‍हीं मीन
उसके बड़े पैरों में
उलझ गई
वो नीचे झुका और
मछली को हाथ मे उठाते हुए
दार्शनिक अंदाज में बोला
“ जा ! मैं तुझे जिंदगी बख्‍शता हूँ “
जैसे ही उसने मीन को
हवा में उछाला
जिजीविषा चीख उठी :
मछली जल की रानी है
जीवन उसका पानी है
हाथ लगाओ उर जायंगी
बाहर निकालो मर जायेगी
मन से निराश मैन को
मीन ने फलसफा दिया
सबके जीवन की कुछ खास वजह है
सबके लिए कुदरत में खास जगह है

और वो
मीठी धरती की
कसैली मिट्टी में
खेलने के लिए
फिर ऊपर आ गया।

अंधा कानून

सुनकर ऐतिहासिक फैसला
जमीन के बॅटवारे का
मुझे डर लगने लगा है
अपने घर मे रखी
किताबे और फोटो
देखते हुए ।
कुरान है , अंबेडकर हैं
गांधी हैं, रामायण है :
कितने टुकड़े कर देगी कोर्ट
मेरे छोटे से उस कमरे के
यदि मुझ पर मुकदमा
ठोक दिया मजहबियों ने
या फिर कर लेगी मुझे गिरफ्तार
पुलिस
गैरजमानती वारंट जारी करते हुए
मार्क्‍स-माओ के वैचारिक ग्रंथों की
लाल जिल्‍द को सबूत बनाकर
नक्‍सली का लेबुल लगाकर
और कोर्ट राष्‍ट्रहित में
पॉच हजार पृष्‍ठों का
ऐतिहासिक फैसला लिखकर
मुझे फांसी पर चढ़ा देगा !

Thursday, October 7, 2010

खबरदार ! बरखुरदार

क्‍यूँ भटकते हो
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर ?
सीधी राह पर चलो,
ओवरब्रिज पर चढ़कर
प्‍लेटफार्म पार करो
रेल की पटरियों को
क्रॉस करते हुए
क्‍यूँ डालते हो
अपनी जान
जोखिम में ?

नियमों को ठीक से
लागू करते हुए फाइल पर
सही फैसले लो
पक्षपात करने के लिए
तथ्‍यों को तोड़-मरोड़कर
क्‍यूँ लिखते हो ?
ऐक्‍सीडंट से बचने के लिए
मशीन और मानव की
व्‍यवस्थित सुरक्षा को
बाई-पास मत करो ।

कुंजी और गाइड पढ़कर
बोर्ड का एक्‍जाम तो
जैसे-तैसे पास कर लोगे
कम्‍पटीशन में क्‍या होगा ?
औरों को धोखा देकर
अपनी आंखों को धूल से
कब तक बचाओगे ?

शॉर्टकट के चक्‍कर मे
जीवन की नैसर्गिक लय को
कट-शॉर्ट मत करो
सावधान !
लेवल-क्रासिंग का गेट बंद है
ट्रेन आने वाली है ।

Thursday, August 12, 2010

उपवास की बकवास

वो जब रूठ जाती थी
तो खाना छोड़ देती थी
यह उसका तप था या जिद
मुझे नहीं मालूम
पर मुझे लगता है
लोग व्रत रखते हैं
दिखावे और भुलावे में
यह जानते हुए कि
रोटी तो मिल ही जाएगी
व्रत की सीमत अवधि के बाद ,
संयम तो उसका है
जो दिन भर भूखा रहा
और शाम के भोजन का
कुछ भी पक्‍का नहीं है ,
डेली वेज पाने को
कल काम मिलेगा
नून तेल लाने को
कोई गारंटी नहीं है।
शौक हैं अमीरों के :
छतरी हाथ मे झुलाते हुए
बरसात में भीगना,
कार में से उतरकर
मॉर्निंग वॉक के लिए
पार्क के चक्‍कर लगाना
या फिर रोड के लैफ्ट साइड में
लिफ्ट की उम्‍मीद लिए
पैदल निकलना
ऑफिस के लिए :
वो प्रयोग कर रहे हैं
योग के नाम पर
गरीब तो घट रहा है निरंतर
घटना के नाम पर।

Friday, July 9, 2010

मां होने का दर्द

शरीर पर सिम्‍पटम उभरने लगे हैं
उसे पता है
इस असाध्‍य बीमारी के बारे में-
वो कैंसर से पीडि़त है !

कैसे सपने आते होंगे उसको
रात में नींद उचटने पर
क्‍या होता होगा उसके मन में
अस्‍पताल में थिरेपी के दौरान
या हाल पूछे जाने पर
उसकी तबीयत का
सहकर्मियों द्वारा
सहानुभूति के तौर पर।

कभी सोचती हूँ
फांसी लगने की तारीख
तय हो जाए
और कैदी को बता दी जाए
तो वो कैसे जीता होगा ?
: पल-पल को
शिद्दत से या बेचैनी में
- काउंट डाउन की तरह।

उसे देखकर मुझे कष्‍ट होता है
मैं कुछ कह नहीं पाती
बस ममता में दुआ करती हूँ
बारगेन कर ले
मुझे उठाकर दुनिया से
हे ईश्‍वर !
मेरे बेटे को स्‍वस्‍थ कर दे।

Wednesday, July 7, 2010

जीवन-प्रभात

जा रही थी मैं
इक सुबह तड़के ही
अपनी छोटी बहन के साथ
टाइकांडो की प्रैक्टिस के लिए
कि अचानक
आ गिरा
हमारे सामने सड़क पर
इक घोंसला
अंडा फूटा
दिखी हमें इक नन्‍हीं जान,
आया दौड़ता हुआ
इक कुत्‍ता
हम सहम गए
न जाने उस निरीह पर
क्‍या बीती होगी उस वक्‍त
हमारी तो चीख निकल गई
मां अपने बच्‍चे को चांच में दबाकर
फुर्र हो गई ।
सब अपने अपने रास्‍ते चल दिए
- हम प्‍लेग्राउंड की ओर
- कुत्‍ता डस्‍टबिन की ओर
- चिड़ी आसमान की ओर
फूटा अंडा वहीं पड़ा रहा
प्रभात का सूरज उग चुका था ।

(Penned after listening a real-life experience of two little kids)

बिलासपुर का वो नागा बाबा

आज उसकी याद आ गयी
जब मैं पैदल ही चला
दफ्तर के लंबे सफर पर
मानसून की पहली बूंदाबांदी में।

वो बुडढा निकलता था
बारिश में घूमने
अलफ नंगा
पेड़ की टहनी को
बेंत बनाकर
मानो करता हो
चैलेंज - कुदरत को
उसे काई डर नहीं था ।

उसके पास कुछ नहीं था
न तन पर कपड़े
न सामान का झोला
न खाने की कटोरी,
किसी से वह
न कुछ बोलता
न कुछ मॉंगता
न कुछ इकठ्ठा करता
कुछ देने पर भी
बस अपनी जरूरत जितना रखता
और बाकी वापिस कर देता
वह सारे मौसम कुछ नहीं पहनता था।

कभी उदास या रोते हुए
मैंने उसे नहीं देखा
हॉं ! वह कभी-कभार हॅसता जरूर था
शायद दुनिया के पागलपन पर
जो उसको पागल समझती थी।

था उसके चेहरे पर
गजब का नूर
जो याद दिलाता था मुझे
ईसा के क्रूस की ,
सबके दुखों और पापों का बोझ
सहते हुए सहर्ष
वह संत था
मस्‍तमौला फकीर था ।

Friday, July 2, 2010

किस्‍तों में खुदकुशी

तुम खुदकुशी करने चले हो ?
डरपोक , बेशर्म , पागल : कहीं के !
क्‍या पाओगे मरकर ?
नरक में भी जगह नहीं मिलेगी ,
अरे ! इतनी मुश्किलों से
मानव-योनि मिली है
इसे यूँ न गँवाओ
संघर्ष का नाम ही जीवन है
जूझो-पिसो-घिसटो-भोगो
और करो इंतजार
उसके बुलावे का
कुदरती मौत मरो
अपनी पसंद की नहीं :
खुदकुशी घिनौना पाप है।

खैर !
मुश्किल भी है खुदकुशी करना
सोचना भले आसान हो
उसका क्षण और तरीका
पर तय तभी होता है
जब वक्‍त का बुलावा आता है :
-30वीं सालगिरह पर
-रिटायरमेंट के 20 दिन बाद
-फांसी लगाकर
-ट्रेन की पटरियों पर
-जहर खाकर
या नदी में कूदकर

मैं मानता हूँ
सोचना चाहिए जरूर
हर किसी को
खुदकुशी के बारे में
ताकि महसूस कर सकें
मौत को
जिंदा रहते ही
और कहीं डरते सहमते ही
न गुजर जाए जिंदगी
समझौतों और मोह माया के
प्रपंच में ।

किस्‍तों में खुदकुशी से
बेहतर है
लगाना छलांग
नौंवी मंजिल से
या फिर दौड़ते हुए
सागर की लहरों मे
समा जाना ।

Wednesday, June 30, 2010

शराब बुरी चीज है

इससे नशा होता है
दिमाग भी भ्रष्‍ट हो जाता है
कभी-कभार गम हल्‍का हो जाए
पर कहीं सिर बोझिल भी हो जाता है
कड़वाहट में खुद को विस्‍मृत कर
किसी दूसरा दुनिया में चले जाते हैं
भूल कर यथार्थ
सुरुर के स्‍वप्‍न-लोक में
डगमगाते पैर और हाथ
थक-कर बड़बड़ाते हुए
सो जाते हैं
नींद भी नहीं आती
बस सुध-बुध खोकर पड़े रहते हैं
ऑंखें मलते हुए उठते हैं जब
ग्‍लानि होती है -
अब नहीं पीएंगे
शाम आती है -
फिर वही दोस्‍त, वही बोतल
और वही बहाना -
''थोड़ी-सी---- बस थोड़ी-सी''
शराब पीने लगती है हमें
जिसे हमने पीना शुरु किया था – कभी।

Tuesday, June 29, 2010

कोल्‍हू के बैल और बछड़े

बच्‍चों का होम-वर्क
बीबी का हाउस-वर्क
साहब का आफिस-वर्क :
सभी मशीन बने हुए हैं
मोबाइल की क्‍लॉक से चलते
स्‍कूली प्रोजेक्‍ट बनाते
किचन मै और आफिस मै
सब घालमेल है
कैरियर और फैमिली मै
सबकी बनी रेल है।

जुटे हैं परिवार के
सारे लोग
समाज में अपना
कद बढ़ाने में
साथ रोटी नहीं खाते
साथ गप नहीं लड़ाते
हॉं….
देख लेते हैं
सासबहू जैसे सीरियल
साथ-साथ
और कर लेते है
सुबह का योगा
इडियट बॉक्‍स के सामने बैठकर
दिन-भर जिंदगी की
वर्कशाप मे खटने के लिए।

Monday, June 28, 2010

गर्मी बहुत है

नींद नहीं आती है
करवटें बदलते
रात गुजर जाती है
भीग जाता है तकिया
बालों की बूँदों से
पसीने में
फिर भी अधमुँदी आंखों में
जब आता है सपना
उस पड़ोस वाली झुग्‍गी का
जहां न बिजली है
न पंखा है
न पानी है,
तो मैं डरता हुआ
सो जाता हूँ
कहीं मेरे घर की
बत्‍ती-पानी भी
गुल न हो जाए।

Friday, June 4, 2010

चरवैति चरवैति

बैठे हुए छत की मुंडेर पर
या खिड़की पर
या फिर बाहर-पत्‍थर की बेंच पर
देखता हूँ मैं
आती-जाती गाडि़यों को
भागती-दौड़ती जिंदगानी में।
रिक्‍शें पर बैठी मोटी औरतें
और उन्‍हें खींचता दुर्बल-सा पुरूष
आकाश पर छितराये बादल
दूर ऊँचाई पर उड़ते कौए
तरह-तरह की आवाजें
झगड़ती पड़ोसिनें
साइरन की लंबी चीत्‍कार
लगता है जैसे यही सब कुछ
अंदर चल रहा हो मन मे
ट्रैफिक की तरह निरंतर
विचारों का जंजाल।
कितना कठिन है
साक्षी बनना
और ब्‍ैठना शांत
जब चारों तरफ कोलाहल हो
दुनियादारी की।
थककर शांति – यह तो मजबूरी है
यात्रा की जरूरत ही नहीं- यह मजबूती है।
जब शरीर हो कमजोर
तो मजबूती और मजबूरी
एक हो जाती है
कुछ समझ में नहीं आता
बैठ जाएं भीड़ मे
कुचलने के लिए
या दौड़ते रहें
निरर्थक और निरुद्देश्‍य।

Monday, May 24, 2010

मैं युधिष्ठिर नहीं हूँ

सबको मरना है किसी रोज
तो क्‍या जीना ही बंद कर दें
एक्‍सीडेंट देखकर सड़कों पर
लोग गाड़ी चलाना ही छोड़ दें
तलाक के मुकदमों से डर कर
शादी का खयाल ही मन से हटा दें
शायद यही बेहतर है लगना
जिजीविषा के लिए-
मेरी मौत नहीं होगी
मेरी टांग नहीं टूटेगी
मेरी गांठ नहीं छूटेगी-
पानी पीने दो
तुम : यक्ष !
या न पीने दो ,
मै तो तुम्‍है यही जवाब दूँगा
सपनों को टूटते हुए देखकर भी
नित नऐ सपने देखना
दुनिया का सबसे बड़ा आश्‍चर्य है
मौत से भी बड़ा।

रौशनी के खंभे

सर पर उठाये,
रौशनी के खम्‍भे
चलती धीरे-धीरे
बारात में
क्‍या सोच रही है वो ?
साथ में चल रही हैं
मोटी-भारी औरतें
लादे हुए जेवर
पुते हुए चेहरे
नशे में चूर
नखरे-सँवारती
मस्‍ती से मदमाती चाल में।
बीच-बीच में
जब कारवॉं रूक जाता है
नाचने लगते हैं बाराती
और वो '' बेचारी '' खड़ी हो जाती है
खंभे को सिर पर सँभालती
ताकती रहती है इंतजार
कब नाच थमेगा
और ''वो'' बोझ उठाए
खड़े रहने की पीड़ा से मुक्‍त होगी।
बारात पहुँच गई है मंडप
रौशनी फैली है चारों ओर
अब उसकी जरूरत नहीं
द्वार से ही उसे और
उसकी सखियों को
वापिस मोड़ दिया जाता है,
जो अभी भी उठाये हैं
सर पर ऊँचे
रौशनी के खंभे ।
पर अब उनकी चाल है तेज जरा
शायद चालीस रुपये पाकर
या जल्‍दी घर पहुँचने को :
खाना बनाना है
बच्‍चों के लिए
जो भूखे ही सोने की
कोशिश कर रहे होंगे
उनके पेट में बारात के
बाजे बज रहें होंगे ।
वह भी अभी भूखी ही है
और बाराती ...... प्‍लेटें चाट रहे हैं।
कल एक और शादी है
उसे भी बुलावा मिला है
रौशनी के ठेकेदार से
आजकल लग्‍न का मौसम है।

Thursday, May 20, 2010

शुक्रिया

बस में आज
मैंने एक सुंदर लड़की को देखा
मुझे ईर्ष्‍या हुई उसे देख
उसके उतरने का स्टैंड आया
वह उठी :
उसके एक पैर था
हाथ में थी बैसाखी
मैंने परमपिता का शुक्रिया किया
मेरे दो पैर हैं - सही सलामत।

मैं दुकान पर गया
मिठाई खरीदने
ब्रिकी करने वाले लड़के ने
मुझसे की मीठी बातें
बोला –
'' मुझे बात करना अच्छा लगता है
मैं देख नहीं सकता न, इसलिए।''
मैंने परमपिता का शुक्रिया किया
मेरी दो ऑंखे हैं - सही सलामत।

मैं बाजार में चलता रहा
एक बच्चा मिला
जो था गुमसुम
हमउम्र बच्‍चों की भीड़ के बीच
जो खेल रहे थे, शोर मचाते
'' क्यूँ नहीं खेलते तुम उनके साथ ''
वह देखता रहा, कुछ न बोला
मुझे पता चला
वह सुन नहीं सकता
मैंने परमपिता का शुक्रिया किया
मेरे दो कान है - सही सलामत ।

हे ईश्वर !
सब कुछ बिल्कुल सही है :
दोनों पैर, दोनों ऑंखें, दोनों कान
और वह सब
जो मुझें याद नहीं रहता
तुम्हारा दिया हुआ
शिकायत क्या करू
और तुझसे क्या मांगू
तूने दिया है मुझे
हैसियत से ज्यादा
धन्यवाद तुझे कोटि-कोटि।

Tuesday, May 18, 2010

इवेन्ट-मैनेजमेंट

आज फिर गया मैं
एक आयोजित कार्यक्रम में
उम्‍मीद से कि
कुछ हासिल कर लौटूँगा।
वही सब कुछ हुआ:
दीप-प्रज्‍ज्‍वलन
मुख्‍य अतिथि का उदबोधन
दो शब्‍दों की लंबी श्रृंखला
परदा, बैनर, फर्श, अर्श
पानी की बोतलें
माइक, पोडियम, लाइट
श्रोता-दर्शक, मंच, वक्‍ता
और बीच-बीच में
स्‍वत: ध्‍वनित तालियॉं।
ईवेंट-प्रबंधन का कितना
सुगम और सहज
तरीका हो गया है, प्रोफेशनल
सिंगल विण्‍डो पर सब कुछ
मिल जाता है-
फूड, टेंट, साउंड, लाइट, हॉल
और कार्यक्रम के
स्‍पॉन्‍सर, वक्‍ता-परफॉर्मर भी।
मंच के लोगों
और सामने बैठे-देखते लोगों में
कितना भेद हो जाता है
जैसे मंच जवाब हो
और सामने केवल
सवाल करने वाले लोग।
सभी परेशान, बोर, बेचैन
किंतु सुनते-झेलते-झल्‍लाते
इंतजार करते कब
कार्यक्रम समाप्‍त हो
और भोजन शुरू हो।
अंत में ..........
सभी मंच के लोगों से अपनी
पहचान का
सबूत देने की कोशिश में
जरा उनसे मैं भी मिल लूँ
जो यह भी नहीं सुनते
कि आप कैसे हैं कहॉं ठहरे हैं
बस अपनी अकड़ में
अभी भी बखानते जा रहे हैं
अपना ही व्‍याख्‍यान, उपदेश
और कि-
'' हमने ऐसा किया
हम यह करेंगे
हम वह करेंगे ''
सब बदल जाएगा
पर हम नहीं बदलेंगे
क्‍योंकि हम, हम हैं
वी.आई.पी मंचों के अध्‍यक्ष
और सर्वज्ञ।
एक और अनुभव
अब नहीं जाऊँगा।
पर नहीं, अब जाऊँगा-
बस नाटक देखने
और इस कविता को
आगे बढ़ाने के लिए
मसाला इकट्ठा करने।
सब जानता हूँ या नहीं
पर जानना चाहता हूँ-
हिपोक्रेसी, डबल स्‍टैंडर्ड :
समाज की गति, स्थिति और दिशा
जो मुझे भी मालूम है
पर सुनूँ तो-
आयोजकों के तमाशों में
क्‍या हो रहा है आज
... चलो, चलें देखने स्‍वांग-
नचनिया, भटरिया और उपदेशक
इकट्ठे हैं
तालियॉं भी तो जरूरी हैं
उन्‍हें नचाने के लिए।

Friday, May 14, 2010

ड्रेस-चेंज

पहनते थे पहले
दुपट्टा और पगड़ी
सभी लोग :
चेहरे पर नकाब
सिर पर टोपी
हया का प्रतीक था
नंगे सिर घूमना
बुरा माना जाता था ।

अब जमाना बदल गया है
बहुत आगे बढ़ गया है
नंगा रहना ही
फैशन हो गया है !

लाया जा रहा है दुपट्टा
आँचल या सिर
ढकने की बजाय
मुँह छुपाने के काम
गरमी की धूप से ,
लोगों की नजरों से
और पगड़ी पहनते हैं सरदार
स्‍मार्ट दिखने के लिए
हैलमेट के तौर पर।

Thursday, May 13, 2010

बिड़ला-मंदिर

पहले लूटा लोगों को
चीजें मँहगी बेचकर
फिर बनवाए मंदिर
उसी डकैती के
इक छोटे से हिस्‍से से
जड़ते हुए अपने
नाम के पत्‍थर
द्वार पर
जिन्‍हें देखकर लगता है
मानो भगवान को
कैद कर लिया हो
और जमानत के लिए उसे
पत्‍थर पर खुदी राशि
जमा कराने का आदेश हो ।

लोग जो लुट कर
बन चुके थे गरीब
अपने मन का समझाने
या फिर पूर्वजन्‍मों का पाप काटने
अभी भी आते हैं मंदिर में
और उन दान-पत्‍थरों को पढ़कर
उन्‍हीं लुटेरों के पुण्‍य की
प्रशंसा करते हैं
थोड़ा पुण्‍य कमाने को
चंद सिक्‍के खुद भी
चढ़ा देते हैं
शीश नवाते
उस मूर्ति के सम्‍मुख
जिसे बनाया होगा शायद
किसी वैसे ही
गरीब व शोषित मजदूर ने।

Tuesday, May 11, 2010

नफरत का बार्डर

कौन ज्यादा देशभक्त है –
दिखाने की होड़ लगी है
नुमाइश है, जुनून है
नारे हैं, झण्डे हैं
शोर है, जोर है
मन में सबके चोर है।
खुदी के फेर में
खुदा के ही बंदों से
नफरत और दूरी:
यह कैसा देशप्रेम है ?
मोहांध और संकीर्णता का पर्याय।
बार्डर पर गूंजती आवाजें
बोर भी करती है
और शायद दिलों में डर भी।

इस पार भी
इंसानों की वैसी ही शक्लें
उस पार भी,
ये इंसानी हदें हैं
जो पक्षियों और पशुओं की
समझ में नहीं आती
चूंकि वे कम समझदार हैं
इंसान से
जिसने बनावटी रेखाओं से
बाँट दिया है
धरती को, कौम को।
आकाश पर अभी उसका जोर नहीं चला
इसीलिए चिड़िया – कौवे अभी
उड़ रहे हैं आजाद
गगन में
उनकी कोई जाति नहीं (चाहे प्रजाति हो)
उनका कोई मजहब नहीं (चाहे पंख अलग हो)
उनकी कोई भाषा नहीं (चाहे आवाजें अलग हो)
वे परिन्दे हैं - आजाद
हम दरिन्दे हैं - बरबाद।

वाघा की सांझ

बार्डर पर भीड़ थी :
परेड देखने का जोश
धक्का - मुक्की, सिक्यूरिटी
और क्रिकेट मैच जैसा शोर।
मैं गेट के बाहर से लौट आया
और पड़ोस के गाँव रोड़ा
( हिन्दुस्तान की तरफ )
चला गया।

सुनसान सड़क
आर्मी के अड्डे
शाम होने को थी
अजान और वंदे - मातरम की गूँज
लाउडस्पीकर पर बजते गीत
(देश – विभक्ति के)
इधर टूटी-फूटी रोड़ पर
छोटे बच्चे टहल रहे थे
उस भव्य – परेड से अनछुए
उनके मन में न जाने क्या होता होगा
: पाकिस्तान के खिलाफ
: पड़ोसियों के खिलाफ
: मुसलमानों के खिलाफ।
पर ये शहरी देशप्रेमी
अपने जुनून और नारों से
नफरत का बीज जरूर बो देते है,
झंडा फहराया - उतारा – चढाया जा सकता है
चुपचाप भी
पर नुमाईश .....

बिजली के तार
ट्रकों की कतार (प्याज और आलू)
मजदूर, फसल – खेत
और चिड़िया – कौओं के लिए
हदें बहुत बेमायने होती हैं
और शायद नहीं भी होती हैं।

गाँव के जानवर
चुपचाप बैठे है
वो हू-हू की आवाजें
कर रहे है
सियासत करते अमन की।
तकसीम और दरारें बनाकर।

Friday, May 7, 2010

हकीकत

सच क्‍या है
वो जो हम देखते हैं
वो जो हम सुनते हैं
वो जो हम महसूस करते हैं
शायद सब कुछ
शायद कुछ भी नहीं
क्‍यूँकि कुछ और भी
देख रही होती है आंखें
सुन रहे होते हैं कान
धुंधला होता है
मन का अक्‍स
अतीत की परत से,
निरपेक्ष होना वाकई
बहुत मुश्किल होता है ।

सच मीठा नहीं भी हो सकता
सच को बयान करने के लिए
रिहर्सल नहीं करनी पड़ती
सच सच ही होता है
नंगा , साफ और पारदर्शी
वो जो होता है - सो होता है।

जिंदगी का मकसद

मुझे जीना है
हाशिए के लोगों के लिए
गूंगों की आवाज बनकर
लंगडों के पैर बनकर
अंधें की लाठी बनकर
बीमारों को हौंसला देना है।

शामिल होना है
गरीब की खुशियों में
अछूत को अपनाना है
लिखनी है उनकी गाथा
जो जीवन के संघर्ष में
इतना उलझे रहे
कि पढ़ना लिखना उनके लिए
लक्‍जरी हो गया।

औरत को आदमी
तो नहीं बनाना मुझे
पर उसमें औरत होने का
स्‍वाभिमान पैदा करना है
और आदमियत के अहम से
उसे उबारना है।

मैंने ईश्‍वर को देखा नहीं
सरकार पर यकीन नहीं
अमीर की लूट रोकने का
मैं खुद ही होना चाहता हूँ
गरीबनवाज और दीनबंधु
लड़ते हुए जुल्‍म के खिलाफ ।
हाशिए के लोगों के लिए ही
मुझे मरना है।

Wednesday, May 5, 2010

मुझसे बुरा न कोय

देता है आम आदमी
बुराई का बदला बुराई से
मगर इंसान है वो जो दे
बुराई का बदला भलाई से ,
रखो ये नसीहत सदा याद
सोचो दूर तलक
बुराई से पहले
और बुराई के बाद ।

न हिंदू बुरा है
न मुसलमां बुरा है
बुराई जो करे
वो इंसान बुरा है
बुरा न होता है कोई
बुरी होती हैं बुराईयां
बुराईयों को मिटाती है
सदा अच्‍छाईयां।

भलाई करना है
सबसे नेक काम
बुराई मिटानी है
जिससे कोई है बदनाम ,
राह सीधी चलते रहो
नफरत घटाते चलो
सत्‍कर्म करते रहो
प्रेम बढ़ाते चलो ।
( D.L.Arora)

Tuesday, May 4, 2010

इंसटेंट मैसेजिंग

पढ़ा इक किताब में :
इजहार करते थे जज्‍बातों का
उस जमाने में प्रेमी
चॉंद को देखकर
अपनी-अपनी छत से
दूर रहते हुए भी
तरंगे भेजते रिश्‍तों में
जरिया बनाते हुए कुदरत को।

कबूतरों को संदेशा पहुंचाते हुए
तो मैंने नहीं देखा
पर अपनी इसी जिंदगी में
पोस्‍टमैन को जरूर मिला हूँ
खत और खबरें ले जाते हुए ,
एसटीडी की पल्‍स चौथाई होने का
इंतजार करते थे देर रात तक
आज की मोबाइल-क्रांति से
दस बरस पहले ही तो ।

सोच कर घबराता है मन
मेरे बूढ़ा होते-होते
कितनी बदल जाएगी दुनिया
और कितना विसंगत हो जाऊंगा मैं
वक्‍त की रफ़्तार में
कहते हुए खांस-हांफ कर
” हमारा भी जमाना था “

Monday, May 3, 2010

बदलता मौसम

सनराइज और सनसैट
देखने जाते हैं दूर
टूर पर लोग
उन्‍हें अपने घर की छत से
सूरज देखने की आदत
जो नहीं रही।

दैनिक भास्‍कर पढ़कर
सब कुछ जानने की कोशिश में
वो सुबह घर के बाहर
उदय हो रहे भास्‍कर को
देखने से वंचित रह जाते है ।

सर ऊपर उठा कर
चल नहीं सकते वो गगन मे
उड़ते परिंदों को निहारने के लिए
जिनकी आवाजें सुनाई नहीं देती
ट्रैफिक के शोर में ।

शीतल बयार की सिहरन को
थोड़ा रूककर महसूस करने में
उन्‍हें डर लगता है
कहीं पीछे न छूट जाएं
जमाने की दौड़ मे।

अब तो बस
ओंधी , बाढ़ या तूफान का
इंतजार रहता है
कुदरत का नजारा
लूटने के लिए।

ऐसा ही रहा
तरक्‍की का सफर
तो मारूति गाडी की तर्ज पर
शब्‍दकोष से उड़ जाएगा
आसमानी रंग का नाम भी
हवा की तरह।

Saturday, May 1, 2010

परछाईयां

आज कल इंसा नजर आता नहीं
चलती-फिरती आती नजर परछाईयां
हाल क्‍या कैसे कहें - कहा जाता नहीं
खुद ही खुद के लिए पैदा करीं परेशानियां
खाने - पीने और जीने में वो हमेशा मस्‍त हैं
चूर मय के नशे में इस कदर हर वक्‍त हैं
कल्‍पना के लोक में लेते सदा अंगड़ाईयां
चलती फिरती……………..
छोड़ राह नेकी की , बदी पर चले
फिर कहो कैसे उन्‍हें मंजिल मिले
जिंदगी में आ गईं अनगिनत बुराइंयां
चलती फिरती……………..
अपनी मर्जी छोड़ उसकी पर चलो
फिर जिंदगी में कुछ हासिल भी हो
करता है वो सब पर मेहरबानियां
चलती फिरती……………..
दूर हो जाएंगी सब परेशानियां
( Poem of a friend : Dev)

Tuesday, April 27, 2010

नजरों के पार

सब चश्‍मा तो नहीं लगाते
न ही सभी चश्‍मा न लगाने वालों की
नजर दुरस्‍त होती है,
तीन चौथाई भरे हुए गिलास को
एक चौथाई खाली कहता है कोई
अपना-अपना नजरिया है.
नजर आता है
किसी को गरीब में अमीर
किसी को अमीर में फकीर
गूंगे की मजबूरी
मौनी की मजबूती है .
अपनी आंखे खुद चैक करो
सही नम्‍बर का चश्‍मा पहनो
तभी देख पाओगे साफ
नजारा कुदरत का
पूर्वाग्रह के रंगों से मुक्‍त।
इनसाइट का सपना
आईसाइट को हकीकत नजर आता है।

Thursday, April 22, 2010

रक्‍त पिपासा

मैं कौआ हूँ
आदिवासी , गरीब और अनपढ़
काला और कुरुप
मेरी आवाज कर्कश है
फिर भी मुझे पानी पीने का हक है
मुझ पर ही क्‍यूँ गढ़ी
तुमने घड़े और कंकड़ की कहानी ?

बिसलेरी मैं खरीद नहीं सकता
पेशाब मैं पी नहीं सकता
मुझे नहीं बोलना मीठा
मैं चोंच से लड़ूँगा
कांव – कांव के नारे लगाऊँगा
सवाल पूछूंगा चिल्‍ला-चिल्‍ला कर
घड़े में पानी कम क्‍यूँ था ?
तालाब कहां चले गए ?
पब्लिक-प्‍लेस में प्‍याऊ क्‍यूँ नहीं है ?

तुमने मेरे हिस्‍से का पानी हथिया लिया है
जल, जंगल और जमीन पर मेरा भी हक है
मैं भी प्राणी हूँ
मुझे भी प्‍यास लगती है
मुझे भी भूख लगती है !

तुम इकट्ठा करो पानी बैंक में
बहाओ उसे पार्क की अय्याशी में
और मैं लाचार ताकता रहूँ
घड़े की तरफ जिसमें
न तो पानी है
न ही पैसा है
घड़े को तुम्‍हारे सिर के ऊपर फोड़ दूँगा
पत्‍थर डाल-डाल कर ।

अगर मेरा एक साथी भी
मर गया प्‍यास से
तो तुम्‍हारा ऐसा घिराव करूंगा
नानी याद आ जाएगी
तुम्‍हें नोंच – नोंच कर खा जाऊँगा
तुम्‍हारा खून पी जाऊँगा !

Friday, April 16, 2010

मेधा बनाम मैगा

मैं नदी हूँ
प्रवाह मेरी प्रकृति है
धारा मेरी धारणा
मुक्ति मेरा मकसद ।
सागर में मैं खुद जाकर मिलती हूँ
पर तुम्‍हें किस ने हक दिया
मेरी राह में रोड़े अटकाने का
ऊंचे डैम बनाकर ।
तुम्‍हारे विकास की अंधेर मे
अंर्तनाद बन गया है क्रंदन
संबंध तो ठीक है
बांध मत बनाओ मुझ पर
मुझे निर्बाध बहने दो
कूड़ा-कचरा फेंककर
नाली मत बनाओ
मुझे जीने दो
दीन मत बनाओ
मुझे आजाद रहने दो
मुझे नदी ही रहने दो !

Tuesday, April 13, 2010

पेयर

दो पैर हैं मेरे
चप्‍पल एक
दूजी जन्‍म के समय ही
कहीं जा छिटकी
उसे तलाशने में ही
बीती जा रही है जिंदगी
आधे-अधूरे जीते हुए.
कभी मिलती-जुलती चप्‍पल देखने पर
उसे पहनने की कोशिश करता हूँ
तो पता लगता है
वो और किसी की थी
थोड़ी निराशा के बाबजूद
फिर जुट जाता हूँ खोज में,
पर अब ढूँढने-फेंकने के चक्‍कर से
इतना ऊब पुका हूँ
कि सोचता हूँ
दूजा पैर ही न होता
तो अप्‍छा था
कभी मन कहता है
नंगे पॉंव ही चल पडूँ
जिंदगी की टेढ़ी मेढ़ी राहों पर
उतारकर इस एक चप्‍पल को भी अपने
दोनों पैरों को लहूलुहान करने.
बैशाखी मुझे नहीं चाहिए
और हाथ में एक चप्‍पल
पकड़े रहने से
झूठी उम्‍मीद बनी रहेगी
चलो ! ऐसा करता हूँ
इस एक चप्‍पल को भी फेंक ही देता हूँ.
हकीकत तो यह है कि
सभी समझौते की चप्‍पल को ही
सही मानकर घिसट रहे हैं
क्‍योंकि नंगे पैर चलने की
उनमें हिम्‍मत नहीं है.

Saturday, April 10, 2010

इच्‍छा

तृष्‍णा बढ़ रही है
उमरिया घट रही है
चॉंदनी को तरसता है चकोर
आग जलती है
मन में अविरल
सागर की प्‍यास बुझती नहीं
जिंदगी बीती जाती है
ऐसे ही उम्‍मीद में
जान चली जाती है
पर तृष्‍णा नहीं जाती है

Thursday, April 8, 2010

कुछ तो लोग कहेंगे

इस धरती पर
इंसान की जिंदगी में
सबसे बड़ा रोग
क्‍या कहेंगे लोग !
इस समाज को
तनिक भी फर्क नहीं पड़ता
किसी के दर्द का
किसी के दुख का ,
यह बड़ा निर्मम है
चुपचाप जीने नहीं देता
चैन से मरने भी नहीं देता.
इक ही रास्‍ता है
इसकी परवाह मत करो
बस अपनी जिंदगी जीओ
जो खुद को ठीक लगे :
वही करो
वही लिखो
और वही कहो.

Tuesday, April 6, 2010

बराबरी का रिश्‍ता

न मैं समंदर हूँ
न तुम दरिया
हम धाराए हैं.
समान होने की कोशिश में
समा तो नहीं पाते हम
इक दूसरे में
पर हकीकत का सामना
करने की बजाय
सपनों की खुशफहमी में
खुद को डाल देते हैं.
बेहतर पनपती है दोस्‍ती
जब हम मंजूर करते है
सखा को जैसा वो है
स्‍पेस देते हुए उसे
उड़ने के लिए
गगन में
समझ , संवेदना और सहयोग का
संगम जरूरी है
प्रेमसागर मे
डूब जाने के लिए.

Monday, April 5, 2010

जाके पैर न फटे बिवाई

कैसे समझ सकता है दर्द
आदमी औरत का
सवर्ण दलित का
अमीर गरीब का
पेटू भूखे-प्‍यासे का
और गृहस्‍थ एकला का.
फिर भी लिखेंगे
अखबारों में
बढि़या कैरियर वाले ही
बेरोजगारी पर
हाल बीमार का
और मेनस्‍ट्रीम के मार्जिन पर
रहने वाले हाशिए के लोगों का
समझने के लिए
उनके बीच
उनसा रहना पड़ेगा.
मुझे लगता है
समानुभूति और स्‍वानुभूति
दोनों ही जरूरी हैं
ईमानदारी से सच
कहने के लिए
लिखने के लिए.

Tuesday, March 30, 2010

वक्‍त गुजरने के साथ

धीरे-धीरे
सब गलत ही होता है
बस कुछ बदल जाता है
बस कुछ भूल जाता है
पर घाव रिसता रहता है
अंदर-ही-अंदर
सड़ांध पैदा हो जाती है
ग्रं‍थियां हो जाती हैं
तनिक और जटिल.
वो दिलासे के लिए
कहते हैं अब भी
धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा
पर मैं जानता हूँ पक्‍की तरह
धीरे-धीरे सिर्फ घुन ही लगता है
अनाज को और समाज को भी
कुछ न करने से
कुछ न कहने से.

Friday, March 26, 2010

क्‍लाइमेट-चेंज

अमीरों का फैशन है
उन्‍हीं का चोंचला हैं
कितनी बेईमानी है
पर्यावरण पर चर्चा करना
जब हम कूड़ा फेंक देते हैं
पब्लिक सड़क पर
पानी के फव्‍वारों से सींचते हुए
अपने प्राइवेट लॉन
और सिर्फ मीडिया मे
ग्‍लोबल गर्मी पर
चर्चाएं पढ़-सुन कर खुद को
उन गंदी बस्तियों के
मजबूर बाशिंदों से
ज्‍यादा जिम्‍मेदार समझ लेते हैं
जो खुले में हगते-मूतते है
और जैसा पानी मिल जाए पी जाते हैं ।

Thursday, March 25, 2010

नया साल

खुशफहमी है
कलगीधारी घोड़े को
स्‍मार्ट होने की
बग्‍गी मे जुते हुए ,
श्‍वेतवर्णी कबूतर को
शांतिदूत होने की
गगन में उड़ते हुए
और पढ़े लिखे आदमी को
मालिक होने की
सरकारी नौकरी करते हुए
ज्‍यादा जरूरी है
ईंटों का बोझा
रात की पहरेदारी
और रोटी पकाना
जिसकी जिम्‍मेदारी सौंपी है
समझदार समाज ने
गधे, उल्‍लू और अनपढ़ औरतों को
मूर्ख की पदवी देते हुए
आओ साथियों !
1 जनवरी को
चंद जहीन लोगों के लिए छोड़कर
हम बहुजन
1 अप्रैल का उत्‍सव मनाएं ,
वही हमारा होली है
वही हमारी ईद है
आज हमारा दिन है
कल से तो फिर सहनी है
मंहगाई की मार
आर्थिक बजट का असर
हम पर ही पड़ेगा
.क्‍योंकि हम मूरख हैं
और तुम हरामखोर।

Sunday, March 14, 2010

नया-पुराना

मौसम बदलता है
मंजर बदलता है
मन बदलता है
वक्‍त बदलता है
जमाना बदलता है
इंसान बदलता है
रिश्‍ता बदलता है
पल-पल बदलती जिंदगी मे
सब कुछ बदलता है।

Friday, March 12, 2010

स्‍वार्थ के खिलाफ

बहुरंगी सृष्टि में
इस धरती के
अलावा भी बहुत कुछ है
मसलन
आसमान-हवा-धूप-रौशनी
सिर्फ इंसान ही नहीं है धरती पर
पेड़-पौधे और पक्षी- जानवर भी हैं
पैसा ही नहीं सब कुछ जिंदगी में
रिश्‍ते-नाते और उनका प्‍यार भी है
देखें सही चश्‍मे से अगर तो
इस अर्थ पर अर्थ को ही
अर्थ समझना
नादानी है।
दौड़ने से न होगा सब कुछ हासिल
दिमाग से सच्‍चा होता है दिल
अक्‍सर हकीकत से सुंदर होते है सपने
और कभी पराये भी हो जातें है अपने ।

घबराहट

वक्‍त गुजारने के लिए
अखबार में सुडोकू खेलते हैं
टीवी के रिमोट पर चैनल बदलते हैं
बिनबात पैर हिलाते रहते है
फोन पर बतियाते हैं
मेडिटेशन की मुद्रा मे बैठ जाते है
अरदास बुदबुदाते है
सोते हुए भी सपने देखते हैं
दिमाग के हर कोने को भर देना चाहते हैं
फिर क्‍यूँ कहा जाता है
खाली दिमाग शैतान का घर है ।
भरा दिमाग क्‍या भगवान का घर है ?
धीमे चलने से डर लगता है
दोड़ते रहने से थकान होती है
जिंदगी बड़ी अजीब है !

Thursday, March 11, 2010

5 कविताएं बच्‍चों की

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मेरी अभिलाषा
-------------------
सुखी रहें सभी धरती पर
यह है मेरी अभिलाषा
रोटी, कपड़ा मिले सभी को
यह है मेरी अभिलाषा
हर बच्‍चे को मिले पढ़ाई
यह है मेरी अभिलाषा
कभी न हो कहीं लड़ाई
यह है मेरी अभिलाषा ।
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मेरा घर
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थक कर आती हूँ
जब मैं बाहर से
देता है आराम
मुझे मेरा यह सुंदर घर।
पढ़ने जब मैं जाती हूँ
रहता हर पल
मन में मेरा घर
छुटटी होते ही दौड़ पड़ती
मैं अपने घर।
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मेरे पापा
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देखती हूँ सुबह उठते ही
पापा को
जो लगे होते हैं तैयारी में
मुझे स्‍कूल ले जाने को।
प्‍यार करते मुझे मेरे पापा
कभी डांट भी देते
पर जब नहीं होती मैं घर
याद करते मुझे हर क्षण
मम्‍मी से करते बातें
मेरे सपनों की
मेरे पापा को फिक्र है मेरी
अपने से भी अधिक।
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मेरा परिवार
-----------------------------
ममता से भरी मॉं
प्‍यार से भरे पापा
छोटी बहिना
और नन्‍हाँ – सा भैया,
यह है मेरा परिवार
और हॉं ! एक दादी भी है
जो मुझे समझाती हैं हमेशा
अपने वक्‍त की बातें
और रोज सुनाती हैं
किस्‍से – कहानी
सोने से पहले।
--------------------
मैं भारत का बेटा हूँ
नाम है मेरा रजत सिन्हादेश
की खातिर लड़ूँगा
मैं जैसे लड़े सूरमा भगत सिंह।
गुरुनानक के प्‍यारे हैं हम
हमें अमन ही भाता है
पर हमको कमजोर न समझो
लड़ना भी हमको आता है
टूट पड़ेंगे दुश्‍मन पर
बन कर हम गोविंद सिंह

Monday, March 8, 2010

ठप्‍पों की थोप महिला पर

मै बिंदी नहीं लगाऊंगी
मैं चूड़ी नहीं पहनूंगी
मैं मांग नहीं भरूंगी
फिर सुहागिन कैसे कहलाऊंगी ?
न मैं माया , न ही छाया
न कोई गुलदस्‍ता
न ढोल-ढोर पिटने के लिए
न ही बाजार का माल बिकने के लिए
न बच्‍चे जनने की मशीन हूँ
मैं भी इक इंसान हूँ।
मैं संगिनी हूँ - अर्धांगिनी नहीं
मां-बहन हूँ - नौकरानी नहीं ,
पति को परमेश्‍वर और
मुझे धर्मपत्‍नी कहना
आदमियत की कोई गहरी साजिश है
मेरी साइलेंस के कारण ही
मुझे शादी के लाइसेंस का
अपने पास रखना जरूरी है
तुम्‍हारे सभ्‍य समाज में
ठीक से जीने के लिए ।
मुझे कुदरत से मिला
अलग तरह का तन
दमन किया सबने मेरा मन
माना सदा मुझे पराया धन
पर रूह मेरी निरंतर सवाल करती है-
सरनेम मैं ही क्‍यूँ बदलूँ शादी के बाद
व्रत मैं ही क्‍यूँ रखूँ करवा-चौथ का
बुरका मैं ही क्‍यूँ पहनूँ
राखी मैं ही क्‍यूँ बोधूं ?
तर्क ( या फिर कुतर्क ) चाहें थोड़ा बदले हों
पर धारणाएं वही हैं-
जहौ नारी की पूजा होती है
वहाँ देवता बसते हैं
आखिर हैं तो वे भी पुरूष ही
इसलिए मुझे स्‍वर्ग से डर लगता है
पर मैं नरक का द्वार नहीं हूँ
डस्‍टबिन या पायदान नहीं हूँ।

Sunday, March 7, 2010

आठ मार्च

जब होगी नर-नारी में समता
तभी मिलेगी मॉं की ममता
जब होगी हर औरत खुददार
तभी मिलेगी बहन का प्‍यार।
निभोओ तुम अपना फर्ज
मत समझो बेटी को कर्ज
पत्‍नी को तुम दो अधिकार
रहेगी वो सदा वफादार।
" आधा है चन्‍द्रमा, रात आधी
आधी है अपनी आबादी
इस आधे-अधूरे जीवन में
हक है हमारा आजादी "

Thursday, February 25, 2010

इलाज

दर्द हुआ मेरे कान में
तो इधर-उधर भागा
जिसने जो नुस्‍खा बताया
वही अपनाया
उस दौरान लगता था
पूरे शरीर में मानो
कान ही हो सब कुछ।
कितने सारे टैस्‍ट कराते हैं
हम किसी रोग में
उसकी ठीक वजह
जानने के लिए
पर क्‍यूँ नहीं सोचते
वैसे ही संजीदगी से
गरीबी-भुखमरी की
खतरनाक बीमारियों के बारे मे
और वंचितों-उपेक्षितों को
सरकारी भीख की
मामूली मल्‍हमपट्टी लगाकर
टरका देते हैं
सड़क की धूल फाकने के लिए
किस्‍मत की खाक छानने के लिए।
डॉक्‍टर भी नही हैं
नर्सें भी नहीं हैं
बेबस रोगी-ही-रोगी दिखते हैं बस
सामाजिक महामारी फैली है चारों ओर
यह कैसा अस्‍पताल है !
यह कैसा सूरतेहाल है !

आस्‍था का विज्ञापन

ऐ भई !
भोर हो गई
नींद से जगो
डुगडुगी बज रही है
बाबा का मॉल खुला है
हर माल ले लो सिर्फ सौ रूपये में
अंजन आंखों के लिए
मंजन दांतों के लिए
तेल मसाज के लिए
चूरन हाजमे के लिए ।
हमारे बाबा ऑल-इन-वन हैं
गुरू-बापू-स्‍वामी-अम्‍मा
हरफनमौला और मस्‍तमौला-
बंदर के करतब सिखाते हैं
सस्‍ता लंगर खिलाते हैं
जनरल नॉलिज की अटपटी बातें बताते हैं
चटपटे जोक्‍स सुनाते हैं
सेहत के लिए खूब हँसाते हैं
और कभी-कभार जादू भी दिखाते हैं।
वे कमाल है
असंख्‍य श्री के सरनेम वाली
महान आत्‍मा हैं
उनमें कई आत्‍माएं हैं
दशानन की तरह
उनके कई मुखौटे हैं
सर्कस का मदारी
मंदिर का पुजारी
दुकान का पंसारी
धंधे का व्‍यापारी
…………
…………..
पर बरखुरदार , खबरदार !
मॉल के बाहर ही खड़े रहना
स्‍मॉल लोगों का
अंदर आना मना है
आज विशेष योग-कक्षा चल रही है
नेताओं और अभिनेताओं के लिए
डॉक्‍टर और इंजीनियरों के लिए।

Wednesday, February 24, 2010

हम छोड़ चलें हैं मेहफिल को

दो दोस्‍त थे
साथ – साथ खाते , बतियाते और रहते
वक्‍त गुजरा
दोनों अपने-अपने काम-काज में
व्‍यस्‍त हो गए
उसका ट्रांसफर हो गया
और उनकी जगहें बदल गईं ।
अभी भी उनकी बातचीत होती
वह थोड़ा जिद्दी थी या तो अब उससे
ठीक से बात न करती
या उसको चिढ़ाती
वह कोशिश करता रहता
टूटता- रूठता
पर खुद ही मान जाता !
पुरानी जगह वाले को
कोई और नया दोस्‍त
मिल गया था
खेल चल ही रहा था
तिकड़ी का
इतने में न जाने क्‍या हुआ
बिखर गई
नयी दोस्‍ती की खुशफहमी
अब वह पुराले दोस्‍त के पास
आना चाहती है
जो इस दुनिया से ही
उठ चुका है
काश !
जीते जी रिश्‍ते की कद्र की होती ।

Monday, February 22, 2010

मिशन का शमशान

शुरू होती है
कोई भी संस्‍था
किसी खास मकसद से
इक महत्‍वाकांक्षा होती है किसी की
सपना कुछ नया करने का
पर जैसे जैसे वक्‍त गुजरता है
उसकी अंर्तआत्‍मा से अहम
हो जाते हैं बाहरी कपड़े
कितनी शाखाएं विदेश में
मैम्‍बर्स में :
कितने इंजीनियर और कितने डॉक्‍टर
संख्‍या से संस्‍था का विकास ऑंकते हैं ।
संस्‍था को चलाना ही
मकसद हो जाता है
फाइनंस-फंड-हाउसकीपिंग
और स्‍टाफ-मीटिंग में
उलझ जाते हैं
कार्यक्रम रखने पड़ते हैं
अस्तित्‍व को बचाने के लिए
और खुद को साबित करने के लिए।
जब मूल संस्‍थापक
चला जाता है दुनिया छोड़कर
तो दिशा ही बदल जाती है
किताबों और फोटो में
सीमित हो जाती है संस्‍था
धीरे धीरे बिखर जाती है
घुटन भी जरूर होती होगी
भीतर के कुछ लोगों को
किंतु किसी राह पर
बहुत आगे निकल जाने के बाद
वापिस मुड़ने के लिए
मजबूत कलेजा चाहिए ।
नियमावली की जकड़न में
कट्टर -कैडर तो बन सकते है
पर सार्थक कुछ भी
नहीं किया जा सकता ।

विन-विन

न चिढ़ना है
न चिढ़ाना है,
न रोना है
न रूलाना है,
न हारना है
न हराना है,
न खुद डरना है ,
न किसी को डराना है.
जीतना है और जिताना है
हँसना है और हँसाना है
चलना है और चलाना है
जीना है और जिलाना है .

Friday, February 19, 2010

देख तमाशा इंडिया का

सरकार के सफेद हाथी
और जनता की चींटियों के
दरम्‍यान हुआ : इक फुटबाल मैच
हाथी ने बाल्टियां भरकर दाल पी
वह और मोटा हो गया
चींटी को मँहगाई की वजह से
इक चम्‍मच शक्‍कर भी
नसीब न हुई
और वह बेचारी दुबली हो गयी.
कॉमन आदमी की वैल्‍थ
और गरीब मजदूरों के खून से
सजे-सँवरे स्‍टेडियम मे
टीमों के उतरने से पहले ही
सबने मान लिया था-
जीतेगा तो हाथी ही
पर उन पिद्दी चीटियों ने
औकात सिखा दी
सूँड और कानों में घुसकर
हाथी को नानी याद दिला दी.
----------------------------------- ------
खेल खेल की आड़ में , लूट सके जो लूट
स्‍टेशन पर रह जायेगा , रेल गई जो छूट
--------------------------------------------
कॉमन आदमी की वैल्‍थ
खेलेंगे हम कॉमन वैल्‍थ.
-------------------------------------------
शोर मचा है , बजेंगे ढोल
मैच मे हम , करेंगे गोल
दिल्‍ली की तू जय बोल
आम आदमी होगा गोल.
------------------------------------------------------
जीतेगा भई जीतेगा
ठेकेदार जीतेगा
हारेगा भई हारेगा
कॉमन-मैन हारेगा.
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कलम की किलकारी

सड़क पर पैदल चलते हुए
किसी किताब को पढते हुए
कोई गीत सुनते हुए
नींद में सपना देखते हुए
या फिर यूँ ही उदास बैठे हुए
कोई बीज पड़ जाता है
अवचेतन मन में
और गर्भ ठहर जाता है.
न जाने कितना वक्‍त लगे
उसे पकने में
किंतु प्रसव पीड़ा गहरी हो जाए
तभी डिलीवरी होगी
और अपनी नवजात गुडि़या को
गोद मे पाकर ही
मुझे तृप्ति मिलेगी.
मेरी रचना चाहे
तुम्‍हें कविता न लगे
पर वो बहुत सुंदर है
और समझभरी भी,
क्‍योंकि उसे मैंने जन्‍मा है
अपनी कोख से
और उसका कोमल स्‍पर्श
महसूस किया है
रोम-रोम की गहराईयों तक
मैंने अपने भीतरण.
वो मेरा अहसास है
वो मेरा जज्‍बात है
वो मेरा हिस्‍सा है
वो मेरा किस्‍सा है.

Thursday, February 18, 2010

जुर्म कुबूल है !

ऑफीसर क्लब में
मेरे पैरों की चप्‍पले देखकर
टोकने वाले जूते टाईधारी सहकर्मी के बारे में
जब मैंने अष्‍टावक्री टोन मे
“चमार “ कह दिया
तो तुम्‍हें दिक्‍कत हुई
सेठ-अफसर की कोठी में
चल रही दलाली को
समझाने के लिए
मैंने उसे “ रंडी का कोठा “ लिखा
तो उन्‍हें बुरा लगा
और किसी को कुतर्क के लिए
“ बकवास “ कहकर फटकारा
तो मुझे शालीनता अपनाने की
नसीहते मिलीं।
लीडरों की डीलरशिप में
तुम वकील हो
और वो जज
तो फैसला तो हो ही चुका।

Wednesday, February 17, 2010

लोगों का काम है कहना

तुम इतनी जिद्दी क्‍यूँ हो
या फिर जिद्दी होते हुए
इतनी प्‍यारी क्‍यूँ हो।
जिद तो ठीक है लेकिन
किसी पल बिना तोड़े जिद
दे सकती हो अहसास
जिद तोड़ने का।
तुम कभी बतालाओगी मुझसे
उसी तरह,
जब संकोच के बावजूद
बेझिझक जता देती थी तुम
अपनापन कुछ ही क्षणों में
जैसे रिश्‍ता कोई जन्‍मों का हो।
मेरी वेदना का दर्द भी
हिला न पाया तुम्‍हें।
यदि यह तुम्‍हारे मन से होता
तो मंजूर होता भी
पर यह तो समाज से डरना हुआ
और वो भी उस समाज से
जिसकी न कोई रीढ़ है,
जिसकी न कोई नीति है।

Monday, February 15, 2010

बगावत

मेरे और उनके बीच
लोहे की मोटो सलाखें हैं
मुझे कैदी वो लगते हैं
और उन्हें मैं ,
पर चूँकि उनकी जमात ज्यादा है
तो आवाज़ तो उन्ही की सुनाई देगी .
समाज की समझ
और परंपरा की इज्‍जत को
मुझसे खतरा है.
वो मुझे सूली पर लटका देंगें
उनसे अलग सोचने के जुर्म में
और अगर फिर भी कुछ दम
बाकी रहा मुझमें
तो तानों के पत्थर मार-मार कर
मुझे खदेड़ देंगें
पागलघर में,
जहां से मेरी चीखें
उनकी मीठी नींद में
खलल नहीं डालेंगी.

Sunday, February 14, 2010

प्‍यार का बाजार

प्रेम कहां है, प्रेम क्‍या है, प्रेम क्‍यूं है
वहां भी नहीं, जहां पहरेदार खड़े हैं
वहां भी नहीं, जहां पार्क में जोड़े लेटे हैं
वहां भी नहीं, जहां घर में बच्‍चे हैं
वहां भी नहीं, जहां जंगल में अकेले हैं।
प्रेम होता है या नहीं होता है
इसकी कोई खास वजह नहीं होती
इसकी कोई खास जगह नहीं होती
प्रेम नाप-तौल या गणित नहीं होता
न ही यह बाजार की नौटंकी है
न ही यह खेल-कूद है तन का।
यह तो मुक्ति का पैगाम है
यह तहजीब है इंसान की
उसकी रूह की जरूरत है।
प्रेम उत्‍थान का पथ है, पतन का नहीं
प्रेम शांति का पथ है कलह का नहीं
प्रेम संकीर्णता नहीं, विस्‍तार का प्रतीक है।
प्रेम की सीमाएं नहीं होती
प्रेम की अभिव्‍यक्ति मात्र हैं: संभोग और विवाह
पर यही केवल प्रेम नहीं है
प्रेम है- ममता,करूणा और संवेदना
भावनाओं और विचारों का संगम
प्रेम संयोग और वियोग है।
प्रेम पवित्र शब्‍द है
इसे विकृत मत बनाओ
व्‍यापार का त्‍यौहार नहीं है प्रेम
यह प्रेमी के दिल की पुकार है
मन मंदिर है
इश्‍क इबादत है।
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती
प्रेम की कोई भाषा नहीं होती
ताजमहल बनाकर उड़ाया था मजाक इक शहंशाह ने
अब प्रेम के संत का तुम मजाक मत उड़ाओं।
प्रेम करो किसी से भी
खुले मन से करो
और उसकी आजादी के लिए।
प्रेम करो:
खुद से, खुदा से,
कुदरत से और उसके बंदों से।
प्रेम को प्रेम ही रहने दो
उसे राजनीति के दलदल में न घसीटो।
ढाई अक्षर ही काफी है
उसे चौदह फरवरी मत बनाओ।

Wednesday, February 10, 2010

अति का भला न बोलना

बहती हुई नदी के किनारे
टहलते हुए मन खुश होता है
जीवन के प्रवाह को
उसमें देखता हुआ ,
उफनती हुई नदी से डर लगता है
और सूखी हुई नदी तो मन को
उदासी में ही धकेल देती है
उत्साह , भय और निराशा के
इन आयामों कव खुद में समेटे
यह वही नदी .
सृष्टि के तत्वों में संतुलन
बहुत जरुरी है
इनके अति-रूपों से
घबराहट होती है
बाढ़ हो या रेगिस्तान
ज्वालामुखी हो या तूफ़ान .
सौम्यता का आधार है
समता और सरलता
संगीत के लिए
वाद्य-यन्त्र के तारों की
मर्यादा जरुरी है .
बीच का रास्ता
समझौता नहीं
समझ का प्रतीक है
कुछ भी नहीं और
सब कुछ के
मध्य ही
यह सुन्दर संसार है .

Tuesday, February 9, 2010

फर्क

औरत पीछे बैठे सीट पर
या चलाये स्कूटर
क्या फर्क पड़ता है-
हम बाज़ार तो घूम आये.
औरत बाँझ हो
या आदमी नपुंसक
क्या फर्क पड़ता है-
हम बेऔलाद ही रहे.
औरत घर संभाले
या काम करे दफ्तर में
क्या फर्क पड़ता है-
हमें घर तो चलाना है.
औरत नीचे रहे बिस्तर में
या ऊपर
क्या फर्क पड़ता है –
हमें विवाह का निर्वाह तो करना है.
फिर क्यूँ चाहियें
औरत को ही-
पिता, भाई , पति या पुत्र
अपने इर्द-गिर्द
पहचान और हिफाज़त के लिए.

Monday, February 8, 2010

हिन्‍दी की हालत

हम सोचते हैं हिन्‍दी में
उल्‍टा-पुल्‍टा अनुवाद करते मन के अंदर
अंग्रेजी में बोलते हैं टूटा-फूटा डिक्‍टेशन
टाइप किए हुए को
कागज पर और कम्‍प्‍यूटर पर
कॉंटते-छॉंटते, ग्रामर को सँवारते
वाक्‍यों को इधर-उधर उठाते-बैठाते
सही शब्‍दों के सही अर्थ
डिक्‍शनरी में तलाशते
साइन करने के बाद भी लगता
कुछ छूटा तो नहीं
व्‍याकरण सही थी क्‍या
फिर भेज देते खत उसको
जो पढ़ने के बाद
मतलब समझने के लिए
फिर डिक्‍शनरी खँगालता है
और अनुवाद करते हुए
मन में मजमून बैठाता है।
हिन्‍दी बोलने में हया
अंग्रेजी बोलने में अकड़ महसूस होती है
शिष्‍टता जताने में: थैंक्‍यू और सॉरी
किन्‍तु गुस्‍सा जताने में गाली हिन्‍दी में ही देते हैं
ताकि दूसरा समझ भी तो सके।
लेक्‍चर देना हो मैनेजमेंट पर तो अंग्रेजी में
किन्‍तु गप्‍प लड़ानी हो तो हिन्‍दी ही भाती है।
जिस भाषा में
मॉं को मॉम, बाप को पॉप या डैडी
कहना पड़े
और अंकल से रिश्‍ते का पता न लगे
इन-लॉ से ससुराल को समझना पड़े
उस भाषा में कल और होगा: के लिए
चाहे अलग-अलग शब्‍द हों
तो भी ......
दर्द के लिए, प्रेम के लिए
गीत के लिए, हँसी के लिए
भाषा तो अपनी ही काम आती है।
कितने भी बड़े साहब हों
अफसर या मैनेजिंग डायरेक्‍टर
रिक्‍शा स्‍टैण्‍ड पर, किराया तय करते
प्‍लेटफार्म पर कुली से बहस करते
सब्‍जी खरीदते वक्‍त मोल-भाव करने के लिए
सभी को वंचितों की दरिद्र भाषा में उतरना पड़ता है।
वो अलग बात है कि हम वंचित होना नहीं चाहते।
कैरियर के लिए
पब्लिक स्‍कूल में
बच्‍चों को अंग्रेजी पढ़ाना है
उन्‍हें जानवरों और सब्जियों के नाम
अपनी भाषा में नहीं
परन्‍तु अंग्रेजी में जरूर मालूम हों
नजाकत के लिए तो
अब हिंगलिश भी आ गई है
कंधे उचकाकर
और मुँह बिचकाकर बोलने के लिए।
हम सचमुच मॉडर्न हो गए हैं
और भारत इण्डिया बन गया है
अब इसे अमरीका बनाने की तैयारी है।
बस इतना ही कहना है तुमसे
कुछ भी पढ़ो, लिखो, बोलो
पर सोचो जरूर हिन्‍दी में
और कभी-कभार गप्‍पें लड़ाया करो
गालियॉं भी दिया करो
अपनी भाषा में।
जिम्‍मेदारी हमारी भी है कि हम हिन्‍दी लिखें
जिम्‍मेदारी तुम्‍हारी भी है कि तुम हिन्‍दी पढ़ो
जिम्‍मेदारी हम सभी की है :
मातृभाषा हिन्‍दी को मॉं समझें।

तरक्‍की का सफर

बहुत पहले लोग नंगे रहा करते थे
तब वे सीधे- सादे थे
प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या से परे
खुद ही में मस्त.
फिर कपडे पहनने लगा इंसान और
शिष्टाचार हावी होता गया उस पर
वह समझदार हो गया और
शायद थोड़ा चालाक भी
अपने दिल की बात को छुपाना
आ गया उसे.
वह मुखौटे बदलने लगा-
घर का अलग
ऑफिस का अलग
बात को टेढ़े तरीके से
कहने का हुनर सीख गया.
अब वह ठण्ड में न नहाने पर भी
उजली कमीज़ पहनकर
दोस्तों को भ्रम में दल देता है.
वो अब सभ्य हो गया है
हाथ से नहीं कांटे-छुरी से खाना खता है
बुफे वाली पार्टी में शामिल होकर और
यूरोपियन कोमोड पर बैठकर
उसकी अकड़ थोडा और बढ़ जाती है.
मैनीपुलेट कर लेता है
हालात और रिश्तों को.
अब अधनंगापन बढ़ रहा है
न पूरे कपडे , न पूरे दिगंबर
जो सबसे ज्यादा मुश्किल है
समझना और इसलिए शायद
डरावना लगता है.

Friday, February 5, 2010

गुरु-सिख

मेरी लम्बी दाढ़ी देखकर
बच्चे मुझे बाबा कहते हैं
बड़े ज्ञानी और
सब मुझे बुज़ुर्ग समझते हैं.
टोकते हैं मजहबी ठेकेदार
मुझे पगड़ी न पहनने पर
कोसते हैं एनजीओ वाले समाजसेवी दोस्त
सरकारी नौकरी में होने पर और
ऑफिस वाले सहकर्मी
उनसे अलग सोच रखने पर.
भेड़ों की भीड़ में
शामिल नहीं होना मुझे और
न ही हांका जाना चाहता हूँ
कर्म-कांडी डंडों से .
विस्तृत गगन में आज़ाद परिंदे की तरह
उड़ना है मुझे
फ्रेम और संस्थाओं की कैद से
मुक्ति चाहिए मुझे
सीखते हुए खुद ही की रौशनी में
अंधेरों से जूझना है मुझे.

Wednesday, February 3, 2010

हम भी हैं

लोग मेरा सरनेम पूछते हैं या
फिर टटोलकर बायोडाटा
मेरी कैटेगरी जानना चाहते हैं
मुझे असुरक्षित महसूस कराने के लिए
आरक्षित होने के कारण
उनकी नज़रों में खटकता हूँ
जैसे कोई अपराधी हूँ मैं
उनकी जन्म-सिद्ध अधिकार की
रोटी का हिस्सा छीनता
अपने विशेषाधिकार से
क्या सर जमीन पर रगड़ने से
तुम चल सकते हो ?
और छाती -जांघ से तो तुम
चलने की सोच भी नहीं सकते ,
अपने दिमाग और दिल का इलाज कराओ
जो अहम् के नशे में ख़राब हो चुके हैं
हम हाथ-पाँव हैं समाजी-शरीर के
पैरों की बदौलत ही टिका पाते हो
अपना बोझ धरती पर और
हाथ से ही कौर दाल पाते हो रोटी की
जिसकी भूख हमें भी है
जिंदा रहने के लिए
टहलने-दौड़ने के लिए
हमें भी मजबूत रखो
समाज को लूला-लंगड़ा मत बनाओ
हमारा नाम मत पूछो
नाम में क्या रखा है
काम देखो

Tuesday, February 2, 2010

अपने ही दुश्मन

मैं खड़ा था जूस की दुकान पर
एक दोस्त के साथ
दो गिलास बनाने का आर्डर देकर
पीछे से एक बुढ़िया आई
और चंद सिक्कों के लिए हाथ फैलाये
मैंने उससे पूछा जूस पियोगी
और उसके चेहरे पर ख़ुशी देखकर
तीसरे गिलास के लिए कहा
तो दुकान पर तैनात मजदूर ने
( वो मालिक तो कतई नहीं था )
नफरत की नज़र से देखा
क्यों होता है ऐसा वर्ग-संघर्ष
उन्हीं के बीच –
बेटे जनने के लिए
बहू को कोसती सास ,
मेकडोनाल्ड के गेट पर
अन्दर जाने से मुझे रोकता
मेरे कपड़ों को देखकर ,
अंग्रेजी किताबों के स्टाल पर खड़ा
हिंदी ही पढ़ सकने वाला सेल्स- बॉय
मेरे चेहरे को देखकर कहता
मन ही मन
" ये इंग्लिश की किताबें हैं "

Monday, February 1, 2010

बिक्री-घर

अफसर की कोठी
रंडी का कोठा
एक जगह जमीर बिकता है
दूजी जगह शारीर
दलाल भी दोनों जगह हैं
नाच दोनों जगह चलता है
मेक अप और मास्क के पीछे
खरीददारों के लिए
अफसर में कोई अल्हड लावण्य नहीं
उसके पास कोई बिस्तर भी नहीं
बस कुर्सी और कलम का कमाल है
कोठा कोठी से बड़ा है
वहां पेशा ईमानदारी से चलता है
पर कोठी का दाम बढ़ता जा रहा है
और कोठे को पुलिस वाले बंद कराते जा रहे हैं

Sunday, January 31, 2010

अमी गांधी बोल्छे

जब मैं जिंदा था
अपने अन्दर की आवाज़ सुनकर-
वही लिखता था
वही करता था
वही कहता था -
जो मुझे उस वक़्त
सच और ठीक लगता था
आज मैं सुनता हूँ
बाहर की आवाजें
जिन्होनें मुझे या तो भगवान बना दिया है
गीता हाथ में पकड़ाकर
महात्मा और बापू से नवाज़ा हुआ
लाठी-चश्मे का बुत
या फिर शैतान
इतिहास की हर घटना के लिए ज़िम्मेदार -
भगत सिंह की फांसी
अम्बेडकर का समझौता
बोस की खिलाफत
जिन्ना का तुष्टीकरण
नेहरु को गद्दी-
हाँ, मैं थोडा जिद्दी जरूर था
पर गुंडा नहीं
जो मेरे नाम के आगे
गिरी,गर्दी या बाज़ी लगाकर
मुझे बना दिया
मुन्ना मोहन से तुमने
गाड से मुझे विशेष प्रेम था
इसलिए ही शायद गोडसे ने ही
मुझसे “ हे राम “ कहलवाया
मैं दोषी हूँ
हरिलाल और मनु-बेन
तुम पर प्रयोग करने का
मुझे माफ़ करो
मैं साधारण इंसान था
तुमने मुझे महात्मा बना दिया
न मुझे राजपाट की लालसा थी
न ही मुझे राजघाट चाहिए
न मेरी वजह से आज़ादी बदली
न ही मेरी वजह से दुनिया बदलेगी
मुझे मत घसीटो
संस्थाओं , तुलना और बहसों में
मेरे नाम को मत भुनाओ
मैंने वही किया
जो मुझे जंचा
तुम वही करो
जो तुम्हें जंचे
हर एक का अपना सच होता है
हर एक का अपना पथ होता है
बस लोकतंत्र में अपनी ज़िम्मेदारी समझो
ईमानदार इंसान बनो
मुझे पढ़कर चर्चा करने से क्या होगा ?
बन्दर ३ या ५ हो सकते थे
व्रत भी नौ ग्यारह या तेरह
कोई फरक नहीं पड़ता
लकीर मत पीटो
अपना सच तलाशो
इस बात का कोई मतलब नहीं
मैं होता तो इस कम्प्यूटर -युग में
क्या इन्टरनेट यूज करता ?
अहम् यह है कि तुम
जो अभी जिंदा हो
क्या करते हो ?
खुद को मुझसे सही या
मुझे आज गलत ठहराकर
तुम कुछ नहीं पाओगे
अपने आप से भागकर कहाँ जाओगे ?
तुम निश्चिन्त रहो
मैं दोबारा नहीं आऊंगा
और इतिहास शायद दोहराता भी नहीं
खुद को हूबहू
उसी ईसा,बुद्ध,नानक या फिर मुझे
देखकर धरती पर
तुम्हें भगवान से ज्यादा
भूत पर यकीन हो जायेगा
और सृष्टि की अनंतता से
यकीन उठ जायेगा
मैं तो अपना जीवन जी कर
जा चुका बरसों पहले
मेरे जैसे बनने की कोशिश मत करो
कोई किसी की कार्बन-कॉपी नहीं होता
अपने दीपक खुद बनो
एकला चलो
मुझे कब्र से बाहर मत निकालो
मुझे चैन से रहने दो
कोई सच अंतिम नहीं होता
यह व्यक्ति और वक़्त के साथ बदलता रहता है

Friday, January 29, 2010

देशप्रेम

दॉंतों में करो ब्रुश कोलगेट का
नहाओ शॉवर में लक्‍स से
नाश्‍ता करो केलगस का
ले जाओ अंकल चिप्‍स स्‍कूल।
पढ़ो जर्मन और फ्रेंच
लिखो रेनोल्‍ड से
बोलो अंग्रेजी टूटी-फूटी
देखो शाम को एम. टी. वी.
पीओ पेस्‍टीकोला और बिसलेरी
और सो जाओ
गटककर पैकेट का दूध
सपने भी दिखेंगे – विदेशी
फिर भी कहना गर्व से -
हम भारतीय हैं,
मेरा भारत महान !

Wednesday, January 27, 2010

मास्‍टर गोकुलचन्‍द के नाम

मुझे याद आते हैं
वो दिन बचपन के
जब मैं तख्‍ती-दवात और कलम लेकर
कंधे पर भारी बस्‍ता ढोता
जाता था-
मंदिर वाले स्‍कूल में
जिसे उस वक्‍त विद्या-मंदिर नहीं
कहा जाता था
और न ही उसमें पढ़ाने वाले
बूढ़े मास्‍टर गोकुलचन्‍द
को सर या टीचर।
उनकी आंखें पत्‍थर की थीं
हाथ में छड़ी रहती थी
धोती पहनते थे गंदी-सी
आवाज कड़क थी
गणित उनके लिए खेल था
बच्‍चे उनका जीवन थे।
और वह चबूतरा ही उनकी कुर्सी थी
जिस पर बैठ वह
पहाड़े याद कराते थे।
बच्‍चों से घिरे
उन्‍हें डॉंटते-पीटते
मुर्गा बनाते, गरियाते-झल्‍लाते
फिर भी बार-बार समझाते।
सॉंस चलती थी तेज
पर लगे रहते पढ़ाने में
दोपहर तक बिन खाये
घंटी भी खुद ही बजाते थे
सभी कक्षाओं को अकेले पढ़ाते थे
स्‍कूल जब बंद हो जाता
तो कोई खाना दे जाता
खाकर और कुँए से पानी पीकर
नीम के पेड़ तले
सुस्‍ताने के लिए जमीन पर ही
पसीर जाते थे।
शाम को टहल आते थे
बाजार की ओर
किसी बच्‍चे का दुकानदार बाप
मास्‍टर जी को बुलाकर
चाय-हुक्‍का पिला देता
और घूम-फिर वे
फिर आ जाते मंदिर में
जहॉं वे खुद पूज्‍य
सिखाते उन्‍हें सबक जिंदगी का
वे मेरे प्रथम टीचर थे
:मास्‍टर गोकुलचन्‍द:
सोई गॉंव के जाग्रत पुरूष।

छब्‍बीस जनवरी

न जाने क्यूँ
मुझे उन शब्दों से घबराहट होती है
जो किसी को विशेष
और बाकियों को शेष बना देते हैं
वर्गीकरण करते हुए
धर्म, जाति, जेंडर
और भाषा की तरह ही
ऐसा शब्द है राष्ट्र
हाँ - मुझे खतरनाक लगती है
राष्‍ट्र एवं नेशन की अवधारणा ,
जो कृत्रिम दुश्मन बना लेती है
दूर-पड़ोस के राष्ट्रों को
और अपनी हिफाज़त की आड़ में
असलों के जमावड़े को सही ठहराती है
परेड इसी राष्‍ट्र-गौरव की
झॉंकी है शक्ति-प्रदर्शन के तौर पर
“ हमारे पास :
इतने टैंक हैं
इतनी तोपें हैं
हम किसी से कम नहीं हैं “
राष्ट्र इक जुनूनी साजिश है
हुकूमरानों की
रियाया के खिलाफ
उन्हें गुमराह करने के लिए
गरीबी और शोषण की असली लड़ाई से
मेरे लिए पाकिस्तानी गरीब
भारतीय अमीर से ज्यादा नज़दीक है
और नेशनल या मल्‍टीनेशनल लुटेरों में
मुझे कोई फर्क नहीं नज़र आता
ज़मीन सबकी है
तकसीम तो हमने किया है इसे
और अजीब बात है
इखरी-बिखरी जमात को
इंटरकास्‍ट मैरिज , सर्वधर्मसमभाव,
राजभाषा , को-एड और यूनाइटेड-नेशंस के नाम पर
वसुधैव कुटुम्‍बकम के आदर्श को पाने के लिए
सम्मलेन और सेमिनारों का
सिलसिला चलता रहता है निरंतर

Sunday, January 24, 2010

परिचय

थी वो
अनजान, दूर, अजनबी
औरों की तरह
मिला जब उससे पहली बार
जागी जिज्ञासा मन में
जानने की उसे।
कल्‍पनाएं बनी
उन मुलाकातों की
जो होती हैं अनायास
देतीं एक आभास
निकटता का।
पैदा करती हैं
समझ और गहराई
उस रिश्‍ते में
जो अभी पनपने को है।
यूँ तो आये ऐसे अवसर
जब बैठी वह पास मेरे आकर
हुई बातें भी -
कुछ मुख से, कुछ नजरों से
लगा जैसे – पहचान बनी है हमारी
समझ की नींव है यह
गहराई अभी दूर ही सही
उतरे तो हम सागर में
पर क्‍या ?
यथार्थ भी कल्‍पना है , शायद !

Friday, January 22, 2010

उम्‍मीद

मैं जब भी रूठ जाता उससे
मन ही मन रोता
गुस्‍सा भी आता
झुँझलाता :
कभी खाने पर
कभी स्‍वयं पर
कभी अपने से नीचे वालों पर
और कभी उस पर भी।
इंतजार रहता
कब आयेगी वो मनाने
इकट्ठे करते रहता
शिकायतें और स्‍पष्‍टीकरण ।
निराशा घेर लेती दिल को
यादें अतीत की
भय भविष्‍य के
वर्तमान को भी
ठीक से जीने भी नहीं देते
और ---
अचानक ही
आ टपकती वह
मुस्‍कान बिखेरती
समझाती और सुनती मुझे
समझती भी थी काफी हद तक
इसीलिए ---- मैं फिर से
जीने का हौसला कर पाता।

योग

1+1=2 ( गणित )
1+1=3 ( व्‍यापार )
1+1=1 ( अध्‍यात्‍म)
1+1=11 ( कला )
ओर कविता भी इक कला है
समीकरणों से परे

Wednesday, January 20, 2010

रिक्‍शे का सफर

अरे भाई, चलोगे
कहॉं ?
तिलक-ब्रिज
कहॉं पर ?
जीपी.एफ., स्‍टेशन के पास
चलेंगे, पच्‍चीस रुपये लगेंगे
हम (मैं और एक गॉंधीवादी मित्र) दो थे।
पच्‍चीस नहीं, बीस लोगे
अच्‍छा, बाईस दे देना
मित्र ने कहा – ''छोड़ो, बस से चलते हैं।''
मुझे रिक्‍शे में बैठना अच्‍छा लगता है
चाहे मँहगा हो, समय हो यदि।
पता नहीं क्‍यों :
राजसी शौक –
राम-सीता की तरह रथ में बैठना
रिक्‍शे का धीरे-धीरे चलना
बैठकर इधर-उधर का अवलोकन
रिक्‍शे का परंपरागत रूप
रिक्‍शाचालक के प्रति दया-भाव
उसको भी रोजी-रोटी मिल जाए
खैर --- बैठ गए रिक्‍शे में –
राजघाट से गॉंधी-पीस-फाउंडेशन की यात्रा के लिए -
स्‍वदेशी, चरखा, कुटीर उद्योग
शरीर-श्रम, स्‍पर्श-भावना पर
करते रहे गहन-चर्चा
और वो हमें ढोता रहा
उदास वह भी न था
भोजपुरी गीत गा रहा था
पूछा मैंने -
तुम कब से हो दिल्‍ली में ?
कहॉं रहते हो ? परिवार कहॉं है ?
रिक्‍शा अपना है क्‍या ?
कब तक चलाते हो रिक्‍शा ?
बोला वो इस सवाली बौछार के बाद-
बिहार से,
यमुना-पुश्‍ता पर झुग्‍गी में
बीबी-बच्‍चे देश में (वह परदेश में है)
किराये पर है रिक्‍शा
सुबह चार बजे से नौ बजे तक
और सायं आठ से रात ग्‍यारह बजे तक
खाना ?
सब-मिलकर बना लेते हैं
हॉं – हमारे गॉंव के काफी लोग रहते हैं
सभी रिक्‍शा चलाते हैं ?
- नहीं, छोटा-मोटा काम करते हैं
: फैक्‍ट्री में,
: चाट का ठेला, मूँगफली, भुट्टा
: पटरी पर दुकान
: मजदूरी, पुताई
: होटल में - बर्तन मॉंजते
तिलक ब्रिज आ गया -
बाबू जी, आप क्‍या करते हैं ?
- हम ! हम पढ़ने-लिखने का काम करते है,
आज यहॉं सेमिनार है
झुग्गियॉं गिराई जा रही हैं
इसके खिलाफ
- पैसे बढ़ाएं :
तीस रुपये (बीस और दस का नोट)
उसने दस का नोट वापिस कर दिया
'' बीस ही ठीक है
आप तो हमारे ही हो। ''
अंदर पसीज गया
'' अरे रख लो
तुम्‍हारा किराया पूरा हो जायेगा
बोहनी समझ लो। ''
उसने नोट माथे पर लगाए
दुआऍं देते हुए
आगे बढ़ गया
किसी ने हाथ देकर, उसे रोका
फिर वही हुज्‍जत --
'' पंद्रह नहीं, दस लोगे। ''

Tuesday, January 19, 2010

पंचवर्णीय बसंत

(1) आज
कैलेंडर में लिखा है
आज बसंत-पंचमी है
इसलिए मान लेता हूँ
बसंत आ गया है
ठीक उसी तरह जैसे
टी.वी. और अखबार में
अपने ही शहर का
तापमान देखकर
ज्‍यादा गर्मी या ठंड लगती है।

(2) ऋतुराज

मौसमों का बादशाह है
इसीलिए शायद अमीरों का ही
होता है बसंत अब
और त्‍यौहारों की तरह
जिन्‍हें बाजार ने हड़प लिया है
ठीक उसी तरह जैसे
आज के राजाओं (नेता-व्‍यापारी-नौकरशाह-बाबा) ने
जनता की खुशियों को।

(3) रंग
पीले रंग का दिन है आज
फूल, मिठाई, कपड़े – सभी पीले
तो या तो तू पी ले
या फिर येलो कलर की गाड़ी में बैठकर
उत्‍सव मना ले।
ठीक वैसे ही
जैसे सफेद साड़ी पहनकर
वो खुद को पवित्र और शांत समझती है
जैसे हरे रंग की लौह-पटलें
रास्‍तों और बस स्‍टैंडों
पर लगाकर ग्रीन किया जा रहा है
राजधानी की सड़कों को
और लाल रंग का झंडा लेकर
वो इन्‍कलाबी बन जाते हैं
रंग- दे-बसंती गीत गाते हुए।
(4) माली

उसका भी है बसंत थोड़ा-सा
जिसने फूलों की पौध लगाई
और उन्‍हें संभाला
बगीचे की मालिकन के लिए
जो आज बहुत खुश है
जूड़े में पीले फूल लगाकर।

(5) उत्‍सव

पथ में नहीं दिखा वो नजारा
जो किताबों में पढ़ा है
जो गीतों में सुना है
स्‍कूल जाते हुए बच्‍चों की
यूनिफार्म भी पीले रंग की नहीं है
और न ही उनकी प्रेयर में सरस्‍वती का जिक्र है
इसलिए कहता हूँ
आज बसंत पंचमी नहीं है।
बस, एक और दिन है
खुशफहमी का
कि नया मौसम आ गया
और अंत कभी होगा नहीं
गुलामी का, गरीबी का
जिनसे चेहरे पीले पड़े हैं उनके
क्‍लाइमेट-चेंज की खबरों के शोर में
बसंत न जाने कहॉं खो गया,
अरे ये लो …बस आ गयी
चलो चलें बैठकर इसी में
बसंत मना लें,
प्‍लास्टिक के फूलों का
गुलदस्‍ता गोद में रखकर।

Monday, January 18, 2010

अंकुर

आज अचानक
मैंने गौर से देखा
खिले हुए पुष्‍प को
और सोच इसके
अतीत के अंकुर के बारे में
मन ही मन मुस्‍कराया।
हॉं, कहीं-न-कहीं
कभी-न-कभी
आरम्‍भ होता है जीवन – इसी अंकुर से।
न स्‍वयं इसको पता है
न प्रकृति को -
भविष्‍य जो है
अनिश्चित और अत्‍यंत रहस्‍यपूर्ण
पर फिर भी आशा का
आधार है यह अंकुर

Friday, January 15, 2010

यूनिफार्म

एक-सी वर्दी पहने हुए
सड़क पर मार्च करती भीड़ के लोगों से
मुझे डर लगता है।
चाहे वह केसरिया वाले साधु हों
चाहे आर्मी के जवान
चाहे श्‍वेत साड़ी वाली बहनें
चाहे ईद पर जा रहे नमाजी
या फिर खादी वाले गांधीवादी।
न जाने कब जुनून सवार हो जाए
औरों की शामत आ जाए।
यूनिफार्म व्‍यक्तित्‍व का हनन है
और इंसान की नुमाईश
बस यह स्‍कूली बच्‍चों के
लोक नृत्‍य में ही अच्‍छी लगती है।
अभी रंग-बिरंगे गंदे
और मटमैले कपड़े वाले
लोग दिखे हैं
जो रिक्‍शे चला रहे हैं
जो चाय बना रहे हैं
और गुब्‍बारे बेच रहे हैं
तभी तो हौंसला बना है मुझमें
भीड़ की विपरीत दिशा में चलने का।

Thursday, January 14, 2010

संदेशे बटन पर

कनेक्‍शन तारों के क्रिस क्रॉस
नेटवर्क के परिपथ में
धारा के प्रवाह का अहसास दिलाते
और नेट-वर्क (कुल-कार्य 0 )
यही तो इस जंजाल का कमाल है
इतना तामझाम और
सिफर अंजाम
कितनी आसान हो गई है आजकल
संदेशों की आवाजाही
फारवर्ड का क्लिक
कैंची-गोंद और कापी की खिचड़ी -
यांत्रिक और इमपरसनल
तुम मेरी तारीफ करो
मैं तुम्‍हारी ,
तुम मेरी शादी में नाचना
मैं तुम्‍हारी में ,
तुम मुझे मूँगफली बेचना
मैं तुम्‍हें ।
दोनों खुश रहेंगे -
तालियॉं बजाने के लिए
दो हाथ ही काफी हैं
और उनकी गूँज सुनने के लिए
तो फिर एक कान ही काफी हैं ।
आपसी समझ के लिए
सचमुच
ताल-मेल बहुत जरूरी है ।

भयंकर भगवान

मैं नहीं जानता
भगवान को कब और किसने
गढ़ा होगा
पर उसके नाम पर
खूब रोटियां सेक रहें हैं
चारों तरफ फैले हुए दलाल और एजेंट
हर मौके : जन्‍म – शादी – मौत : पर
उनको अपना हिस्‍सा चाहिए
कर्मकांड की आड़ में

वो डराते हैं भगवान के नाम पर
लोग डरते हैं भगवान के नाम पर
उनकी दुकानें चलाने में
सब मदद करते हैं
मीडिया - व्‍यापारी - नेता
और कुछ हद तक हम पढ़े - लिखे लोग भी
चुप रहकर या
फिर खुद ही
उस भगवान से डरते हुए
संस्‍कारवश
जिसको न जाने
किस समझदार और भावुक इंसान ने
गढ़ा है

पुरानी दिल्‍ली स्‍टेशन के सामने

न जाने किस उम्‍मीद पर
जिंदा हैं लोग
बीमार-लाचार-अपाहिज
और भूखे-नंगे
रहने को जगह नहीं
पीने को पानी नहीं
खाने को रोटी नहीं
चेहरे पर रौनक नहीं
ऑंखों में सपना नहीं
कहने को कोई अपना नहीं
नौकर और मजदूर की जिंदगी जीते
सहते हर वक्‍त
सिर्फ जुल्‍म और जिल्‍लत
सहमे - ठहरे हुए
न रोते - न हँसते
ठोकर खाते चप्‍पलें घिसते
थक कर सो जाते
शायद सुबह की खुशफहमी में
जिंदा हैं इसलिए ये
गरीबनवाज के आस्‍थावान बंदे
क्‍योंकि आत्‍महत्‍या को पाप मानते हैं
और इस नारकीय जीवन को अपनी किस्‍मत

Wednesday, January 13, 2010

मौसम

हम हर मौसम को
कोसते रहते हैं -
गर्मी बहुत तेज है
ठंड बहुत ज्‍यादा है
बरसात थम नहीं रही
बरसात पड़ नहीं रही -
इन्‍हें सहना ही होगा
मजबूरी से या मजबूती से
इंसानी छतरी का सीमित इंतजाम
कब तक और कितना टिकेगा
अबूझ कुदरत के सामने
उस नीली-छतरी वाले की :
जो न दिखता है
जो न सुनता है
पर करता है
अपने मन की
उसकी रजा में राजी रहना
मंजूरी ही एकमात्र विकल्‍प है -
आखिर यह मौसम भी बदलेगा ही
और वक्‍त गुजर जायेगा

Tuesday, January 12, 2010

उलझन

कभी मन होता उद्वेलित
सोच क्‍या हुआ ?
सोच क्‍यूँ हुआ ?
आड़ी-तिरछी रेखाऍं
एक दूसरे को काटतीं
बनातीं आकृति दिल में
मकड़ी के जाल-सी।
फिर अचानक जब हो जाता
चित्र इतना उलझा
स्‍पष्‍टत: नजर नहीं आता कुछ
लगता कुछ बना तो है
मानस-पटल पर
पर लिए शून्‍यता स्‍वयं में।
तब सोचता हूँ – मैं भी खो जाऊँ
रेखाओं की तरह
उलझ जाऊँ इतना
कि सुलझाने की जरूरत ही न रहे
न फिर रहे कोई प्रश्‍न शेष
और न किसी उत्‍तर की आशा।

इक बहन की ओर से

वो कहता था : जीना नहीं चाहता
डॉक्टर कहते थे : इलाज हो नहीं सकता
हम सब -उसके रिश्तेदार- भी परेशां थे
जब उसको बुलावा आ गया वक़्त का
वो नया साल ( २०१० ) मनाने
हम सबको इस पुरानी दुनिया में छोड़कर
अपने निजधाम चला गया
( यह दुनिया तो आखिर सराय ही है न मुसाफिरों के लिए)
बिछुड़ने का दुःख तो होगा ही
अपने उस प्यारे भैया का -
जिसे मैं अब देख नहीं सकती
जिसे मैं अब सुन नहीं सकती
जिसे मैं सुना नहीं सकती ( अपना दर्द )
जिसे मैं में छू नहीं सकती
वो जिसके संग बीता था बचपन
साथ की थी पढाई
शरारतें, शिकायतें
रूठना और मनाना
और कभी-कभार लड़ाई भी
वो समझता था मेरा मन
आखिर भाई था मेरा -
सपनों में आज रात भी आया था

कुली

अकड़ के उतरे साहब
रेल के डिब्बे से
दोनों हाथ जेब में डाले
जैसे वो कट गए हों
कुली पीछे-पीछे बोझा उठाये
और साहब की बीबी अपने नाज़-नखरे संवारती ,
टकराए अचानक साहब एक खम्भे से
और धम से नीचे गिर पड़े
चिल्लाये : अरे देखकर नहीं चला जाता
खम्भा वहीँ खड़ा रहा
पीछे से कोई बोला-
" ई भाई , इन्हें भी उठा लो सर पर अपने "
आखिर सर ही तो हैं-साहब
हर एक के सर पर सवार
अब दोनों हाथ ज़मीन पर थे
पर अकड़ उनकी ज्यों की त्यों बरक़रार थी-
सीधी सतर लठ्ठ जैसी

Monday, January 11, 2010

आउटसोर्सिग

तुम्‍हारे पास
गेहूँ उगाने के लिए जमीन है
पर आटा खरीदो दुकान से,
गायें (मॉं) हैं घर में पर
दूध खरीदो मदर-डेरी से,
मशीनें हैं, फैक्‍टरी हैं पर सामान बाहर से खरीदो :
कामन-वैल्‍‍‍थ का खेल खेलते हुए
हम ठेकेदार
नौकरशाही के साथ मिलकर
खूब गोल कर रहे हैं
डी (दिल्‍ली) में।

अपेक्षा और उपेक्षा

मैंने माँगा प्यार उससे
मुझे उपेक्षा मिली
ताकि मैं तुम्हारे नजदीक आ सकूँ।
मैंने चाहा उससे मिलना अकेले
मुझे ग्रुप में आने का कहा गया
ताकि मैं संगठन में रहना सीखूँ।
मैंने माँगा उससे भोजन
मुझे कुछ न मिला
ताकि मैं भूखे रहकर तप सकूँ।
मैंने चाहा इक जगह रहना
मुझे ट्रांसफर मिले बार-बार
ताकि मैं रोशनी फैला सकूँ हर जगह।
मैंने माँगी मौत दुखी होकर
मुझे मिले चैलेन्ज
ताकि मैं जीवन जी सकूँ।
मैंने चाहा लोग मुझे समझें
मुझे मिले व्यंग्य और कटाक्ष
ताकि मैं गहराई में उतर सकूँ।
मुझे तुमने वह सब दिया
जो मैंने नहीं माँगा था
जो मैंने नहीं चाहा था
क्योंकि तुम .......... हाँ, तुम ईश्वर
जानते थे
मेरी क्या जरूरत है
उस यात्रा के लिए
जिस पर मुझे चलकर
तुम तक पहुँचना है
शुक्रिया ! भगवान
तुमने मेरी नहीं सुनी-
नहीं तो-
मैं भटकता नहीं, तुम्हारी तलाश में
और कैसे बनती रचना, वेदना के बिना।
मुझे एकांत की बजाय
बाजार की भीड़ में भेजा गया
ताकि मैं साधना को सही अर्थो में
साध सकूँ।
मुझे मिली उदासी हर जगह
माँगी जब भी खुशी
ताकि मैं उदासीन हो सकूँ।
चाहा जब रिटर्न
तो धोखा और बेवफाई मिली
ताकि जगत की झूठी प्रीत को समझूँ।
मुझे मारी ठोक रें सभी ने
ताकि मैं मुड़ सकूँ
परमात्मा तुम्हारी ओर।
हे ईश्वर ! अब तुमसे माँगता हूँ
ठोकरें, उपेक्षा और व्यंग्य
कराओ दुख और मौत का एहसास
ताकि मुझे इस संसार की निस्सारता का
कोई भ्रम ही न रहे।
मुझे थका दो इतना कि
मैं तुम्हारी गोद में निढाल होकर
गिर पडूँ
तुम सुला दो, मुझे अब
और कुछ नहीं चाहिए
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं

Friday, January 8, 2010

चौसर का खेल

उन्‍हें लगता है
वे खिलाड़ी हैं
शतरंज की बिसात के -
मोहरों को इधर-उधर चलाकर
शह और मात की खुशफहमी में पड़े हैं।
चाल चलनी है
पैदल को पीटना है
हाथी को आगे बढ़ाना है
ऊँट को बचाने के लिए
घोड़े को बीच में रखना है।
रहम आता है उनकी नादानी
पर कोई कठपुतलियों का
नाच नचा रहा है
उन अनजान महारथियों को।

एकला

वह अकेला है
अकेला किसी का नहीं होता
कोई उसका नहीं होता।
दुनिया से अलग रहता है
सड़कों पर भटकता है
उसका कोई घर नहीं
मन उसका कहीं लगता नहीं।
सब या तो औपचारिकता निभाते हैं
या उसे उपेक्षित करते हैं
निराशा की दहलीज पर
पहुंच जाता है कभी कभार वो
फिर भी न जाने कौन
खींच लाता है उसे
इस नाटक में वापिस
कौन
उम्‍मीद, निश्‍चय या वह अदृश्‍य शक्ति
जिसे वो अपना सारथी मानता है।
वह अकेला जूझता जिंदगी से
दुनिया की माया से
चलता एकला ही निर्जन पथ पर
जब छोड़ देते सब उसे अकेला।
वह अकेला की काफी है
जीने के लिए
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
पर एकला-
अपने पागलपन और सनकपन से
बुद्धिमानों की महफिल में
खलबली जरूर पैदा कर सकता है
अटपटे सवाल उठाकर भीड़ में
नये जवाब तलाशने को मजबूर कर सकता है।
उसे नकारो, दुत्‍कारो और लताड़ो
दुनिया के समझदार रखवालों
ताकि उसे तुम्‍हारा रंग ही न लग सके
उसकी मदद करो
झिड़ककर और मजाक उड़ाकर
वह मजबूर नहीं वरन मजबूत है
चाहे भाग्‍यवान न हो
पर भगवान उसके साथ है।
एकला किसी से नहीं डरता
न ही किसी को डराता है
वह मुक्‍त है
और सबकी आजादी चाहता है।

Thursday, January 7, 2010

राइट टू वर्क

ठेकेदार के हाथ में डंडा
अफसर के हाथ में कलम
और उनके हाथ में हैं पैनीं दरांतियां
जो निकली हैं झुंड में
कालोनी की घास
काटने के मिशन ( काम ) पर
उन मेहनती और गरीब
घसियारन बहनों से
चिल्‍लाकर कहने को मन होता है-
काट डालो गले उन सबके
जो देते नहीं दिहाड़ी तुम्‍हें पूरी या वक्‍त पर
और ताड़ते हैं तुम्‍हें गलत नजरों से
विडम्‍बना यही है-
राजा - एक - होता है
शासन करते हुए
खाट तोड़ने के लिए
प्रजा-अनेक –
शोषित होने और खटने के लिए

Tuesday, January 5, 2010

सीधे-सादे लफ्जों में

कितना मुश्किल है -
सादगी और ईमानदारी पर कविता लिखना
आज अहसास हुआ।
जब चारों तरफ माहौल हो
झूठ, दिखावे और धोखे का
देते हों सौगात प्‍यार से ठेकेदार
और लेते रहें बिना हिचक सरकारी सेवक :
मिठाई का डिब्‍बा दीपावली पर
नई-नवेली डायरी नव-वर्ष पर
होटलों में होती रहें मुलाकातें और
ऑफिस के फोन पर रात में लंबी बातें:
दलाली और समीकरणों की।
जब रिश्‍वत मांगनी न पड़ती हो
खुद ही मिल जाती हो
'' क्‍यू '' तोड़ने के लिए तत्‍काल सेवा की
फीस भी लीगल हो जाए
हर काम का दाम तय हो पहले से
अलिखित करार के रूप में:
काम हो जाएगा, दाम पहुँच जाएगा
काम करे जो दाम लेकर:
वह ईमानदार
काम न करे जो दाम लेकर भी:
वह बेईमान
जो काम करे और दाम भी न ले:
वह पागल।
कमाओ किसी भी तरह
बस कुछ हिस्‍सा दान कर दो
काले को सफेद करने के लिए
खूब जमकर खाओ और
पेट कम करने के लिए
थोड़ा प्राणायाम कर लो।
सचमुच बहुत मुश्किल है -
इस दौर में ऐसे विषय पर लिखना
क्‍योंकि : या तो इसे नैतिकता का प्रवचन
मानकर नहीं पढ़ा जाएगा
या इसके लेखक को सनकपन का प्रमाण-पत्र दे दिया जाएगा।
संवेदनाएं शून्‍य हो चुकी हैं
ना ही कोई कचोट होती है दिल को
माना और स्‍वीकारा जा चुका है
: सभी ऐसा करते हैं
: इतना तो चलता है
: यही तो विकास है
: यही तो बाजार है
दिमाग से दिल की दूरी बहुत बढ़ चुकी है
तर्क भावनाओं पर हावी है आज
आज के भागम-दौर में
कविता लिखना :
वो भी ऐसे सीधे-सादे विषय पर
वाकई बहुत मुश्किल है।

Monday, January 4, 2010

duniya ka DRAMA

संसार का नाटक

सब एक दूसरे पर हँसते हैं-
दाढ़ी वाला सरदार - चुटैया वाले पंडित पर
चोंगे वाला पादरी - झोले वाले समाजसेवी पर
टोपीवाला हाजी - तिलकधारी पुजारी पर
दिगम्बर साधक - सरमुंडे जोगी पर।
सफेद साड़ी - रंगीन साड़ी पर
गजरे वाली - बुरके वाली पर
काला गोरे पर , भूरा काले पर
टाई - पजामें पर, जूता - चप्पल पर
जींस - लुंगी पर, भगवा - हरे पर
बूढ़ा - बच्चे पर, आदमी - औरत पर।
सभी नमूने हैं अजीब
करते नौटंकी इस दुनिया में
अपनी-अपनी।

Sunday, January 3, 2010

कैसी आजादी

कैसी आजादी

है- भाषा की गुलामी

साहब की गुलामी

जोरू की गुलामी

मन की गुलामी

कहॉं है गुलामी

है- किसी को भी गाली बकने की आजादी

सड़क पर खड़े होकर मूतने की आजादी

आवारा बेकार घूमने की आजादी

दंगों में घर जलाने की आजादी

कैसी आजादी

है- हर जगह क्‍यू की गुलामी

बाजार में महँगाई की गुलामी

कोर्ट के चक्‍करों की गुलामी

थाने की दहशत की गुलामी

कहॉं है गुलामी

है- कार और मोबाइल चुनने की आजादी

खुलेआम रिश्‍वत लेने की आजादी

मैच में सट्टा लगाने की आजादी

कैसी आजादी

है- सरकारी बाबुओं की फाइलों की गुलामी

आश्रम में गुरूओं की गुलामी

भीड़रैली में नेताओं की गुलामी

डाक्‍टर की फीस की गुलामी

कहॉं है गुलामी

है- बोतल का पानी पीने की आजादी

पिज्‍जा खाने की आजादी

सरकारी दुकान की दारू पीने की आजादी

वैधानिक चेतावनी के बावजूद:

गुटका खाने और सिगरेट का धुऑं उड़ाने की आजादी

संत का चोंगा पहनकर प्रवचन देने की आजादी

डोनेशन देकर मैनेजमेंट-कोटा से सीट पाने की आजादी

बेहिसाब मुनाफा कमाने की आजादी

अखबार में नंगी तस्‍वीरें छापने की आजादी

बच्‍चे पैदा करने की आजादी

कैसी आजादी

है- सोच की गुलामी, विचार की गुलामी

दिमाग की गुलामी, बाजार की गुलामी