Sunday, February 14, 2010

प्‍यार का बाजार

प्रेम कहां है, प्रेम क्‍या है, प्रेम क्‍यूं है
वहां भी नहीं, जहां पहरेदार खड़े हैं
वहां भी नहीं, जहां पार्क में जोड़े लेटे हैं
वहां भी नहीं, जहां घर में बच्‍चे हैं
वहां भी नहीं, जहां जंगल में अकेले हैं।
प्रेम होता है या नहीं होता है
इसकी कोई खास वजह नहीं होती
इसकी कोई खास जगह नहीं होती
प्रेम नाप-तौल या गणित नहीं होता
न ही यह बाजार की नौटंकी है
न ही यह खेल-कूद है तन का।
यह तो मुक्ति का पैगाम है
यह तहजीब है इंसान की
उसकी रूह की जरूरत है।
प्रेम उत्‍थान का पथ है, पतन का नहीं
प्रेम शांति का पथ है कलह का नहीं
प्रेम संकीर्णता नहीं, विस्‍तार का प्रतीक है।
प्रेम की सीमाएं नहीं होती
प्रेम की अभिव्‍यक्ति मात्र हैं: संभोग और विवाह
पर यही केवल प्रेम नहीं है
प्रेम है- ममता,करूणा और संवेदना
भावनाओं और विचारों का संगम
प्रेम संयोग और वियोग है।
प्रेम पवित्र शब्‍द है
इसे विकृत मत बनाओ
व्‍यापार का त्‍यौहार नहीं है प्रेम
यह प्रेमी के दिल की पुकार है
मन मंदिर है
इश्‍क इबादत है।
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती
प्रेम की कोई भाषा नहीं होती
ताजमहल बनाकर उड़ाया था मजाक इक शहंशाह ने
अब प्रेम के संत का तुम मजाक मत उड़ाओं।
प्रेम करो किसी से भी
खुले मन से करो
और उसकी आजादी के लिए।
प्रेम करो:
खुद से, खुदा से,
कुदरत से और उसके बंदों से।
प्रेम को प्रेम ही रहने दो
उसे राजनीति के दलदल में न घसीटो।
ढाई अक्षर ही काफी है
उसे चौदह फरवरी मत बनाओ।

1 comment:

  1. बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है

    ReplyDelete