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Thursday, April 5, 2012

नौ - कर

हुक्‍म चलाते है मुझ पर
घर के सारे लोग
साहब , बीबी और बेबी -
1) एक गिलास ठंडा ठंडा पानी तो लाना
2) बालकानी से आज का अखबार उठाना
3) अंदर वाला कमरा ठीक से साफ कर दो
4) बाहर तार पर गीले कपड़े सूखने डाल दो
5) मुन्‍नी को उसके स्‍कूल छोड़ते आना
6) लौटते हुए बाजार से दही लेते आना
7) फोन को थोड़ा चार्जिंग पर लगा दो
8) अभी बस गरमा गरम चाय पिला दो
9) पंखा जरा हाई स्‍पीड पर करते जाओ -
पिछला काम खत्‍म नहीं हुआ कि
अगले का आर्डर मिल जाता है ,
हैं तो मेरे भी दो हाथ ही
पर मैं हूं इस घर का नौकर
काम तो करने ही होंगे मुझको
चाहे हंसकर चाहे रो कर ।

Friday, March 30, 2012

न्‍याय के बारे में

1 ) कानून के हाथ छोटे हैं

कहा जाता है
फांसी के पक्ष में -
यह जरूरी है
कठोर सजा के तौर पर
दहशत फैलाने के लिए
कल के अपराधियों में ,
यकीन कर लूंगा मैं भी
इस दलील का
जब चढ़ जायेगा फांसी
किसी दिन , कोई इक
चीफ मिनिस्‍टर - शहर को दंगों में झुलसाने वाला
राजनेता - मस्जिद ढहाने वाली भीड़ को भड़काने वाला
अमीर व्‍यापारी - तंदूर में औरत को जिंदा जलाने वाला
सरकारी दलाल - वतन की हिफाजत को गिरवी रखने वाला
कालाकोटधारी जज - गलत और देरी से फैसला सुनाने वाला
पुलिसकर्मी - बेगुनाह को जेल में ठूंसने वाला
अफसर - रिश्‍वत में अपना जमीर बेचने वाला ,
पर अभी तो बहुत छोटा है
फांसी का फंदा
बड़े लोगों के गलों के लिए
जिनके पास है कुर्सी और पैसे की ताकत
जिरही वकीलों को रखने की
जो बाल की खाल निकालकर
या फिर गवाह को खरीदकर
केस खत्‍म करा देते हैं और
उन्‍हें बाइज्‍जत बरी करा देते हैं ,
फिलहाल तो
मैं फांसी की सजा के खिलाफ हूं
जो अक्‍सर दी जाती है
बेचारे बकरों को ही
बलि के तौर पर ।

2) ब्‍लैक - मेल

धरने पर बैठकर
शहर में बंद रखकर
रेल- सड़कें रोककर
वाहनों को आग लगाकर और
जूलूस की भीड़ से
माइक की आवाज मे
नारे बुलवाकर ,
वो करवाना चाहते हैं
अपनी मनमर्जी का फैसला
उनकी कलम से ,
जो इतने सहमे हुए हैं कि
फैक्‍टरी में हड़ताल की
धमकी से ही
डर जाते हैं ,
वो उन्‍हें झुकने को कहते हैं
जो लेट ही जाते हैं औंधे
पेट के बल
रीढ़ की टूटी हडृडी के भरोसे।

3) सूली और जहर से आगे

रस्‍सी भी तो अब असली नहीं मिलती
चाइना की प्‍लास्टिक वाली डोरी से
काम चलाना पड़ता है ,
फासी का तरीका भी बदलना चाहिए
टेक्‍नोलाजी के जमाने में
बम , रिवाल्‍वर और साइनाइड का
इस्‍तेमाल होना चाहिए ।

4) माई लॉर्ड

खुदा ने अपनी इमेज में आदमी को बनाया
आदमी ने खुद को समाज का जज बनाया
आदमी को सुनाता है फांसी की सजा आदमी ही
आदमी को चढा़ता है फांसी पर एक आदमी ही
आंख के बदले आंख निकालना - अगर सही होता
तो इतिहास की किताबों मे
बाल्‍मीकि और अंगुलिमाल का कोई जिक्र न होता ।

Saturday, March 24, 2012

चढ़ते सूरज को सलाम

जब वह स्‍कूल में पढ़ता था
तो रोज उसे डांट पड़ती थी
क्‍लास में ऊटपटांग सवाल पूछने के लिए
होमवर्क गलत- अधूरा करने के लिए
प्‍लेग्राउंड में ज्‍यादा वक्‍त बरबाद करने के लिए
उसे चेतावनी भी मिली
कम हाजिरी के लिए ,
इतने ना - लायक छात्र का
फोटो सुशोभित है अब
स्‍कूल के मुख्‍यद्वार पर
जिसे फांदकर
वह चला गया था
मैच खेलने
इक दोपहर और फिर मुड़कर
उसने कभी नहीं देखा
स्‍कूल का मुंह
जिसे उस पर है नाज
जो छाया है आज
मीडिया की सुर्खियों में
गोल्‍फ चैम्पियन बन कर ,
किंतु कहावत आज भी सुनाई देती है
स्‍कूल के गलियारों में -
” पढ़ोगे लिखागे बनोगे नवाब
खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब “

Friday, March 23, 2012

घर पर खड़े रहो दिन भर

गाड़ी खड़ी है
बंगले के अहाते में ,
साहब के बाहर आने का
लंबा इंतजार करते-करते
वह अब गया है :
चक्‍कर लगा लेता
हर पॉंच-दस मिनट बाद
बेचैन, थका, झुंझलाता
छोड़ कर जा भी नहीं सकता
कभी गाड़ी के अंदर जा बैठता
कैसेट पर पुराने गीत सुनता
बीड़ी फूँकता बीच-बीच में
गुटका खाता, पान चबाता
मोबाईल पर बतियाता
कभी गाड़ी का दरवाजा खोलता ,
कभी उसे बंद करता
जाने क्‍या सोचता होगा ...
कैद है वह
गाड़ी का चालक होने के बावजूद
वह गाड़ी ड्राइव करता है
और साहब ( व उनकी मैडम )
उसकी जिंदगी ड्राइव करते हैं,
कभी भी फोन घुमाकर बुला लेते हैं
उसे नहीं मालूम होता
कहॉं जाना है।
किसी दोस्‍त के घर पहुँचकर
खुद तो साहब गपशप और
मौज-मस्‍ती में
डूब जाते हैं
वह बाहर बैठा
इंतजार करता रहता है
कभी-कभार पूछ लेता है
पानी, चाय या नाश्‍ता
कोई घरवाला ।
मन तो होता होगा उसका
कभी गाड़ी लेकर भाग जाऊँ
या बीच में ही गाड़ी बंद कर
कह दूँ
अब आगे नहीं जा सकती
खराब हो गई
परंतु डरता भी है
झूठ बोलने से
धोखा देने से,
हायर्ड ड्राइवर है
फायर भी तो हो सकता है।
साहब, बाहर निकलकर
एक मिनट भी इंतजार नहीं
कर सकते-
वह चाहे घंटों
इंतजार करता रहे
बाहर निकलने वाले नखरैल
साहब का
मैडम साथ हों
फिर तो कहना ही क्‍या :
इंतजार भी लंबा
गुस्‍सा भी ज्‍यादा
और उसकी कैद भी कड़ी :
'' समय से नहीं आए..
इंतजार नहीं किया जाता...
पेट्रोल चुराते हो...
निकम्‍मे हो...''
यूँ तो हैं : वे साहब भी
अधीर, चोर, और निकम्‍मे
किन्‍तु थोड़ा बड़े दर्जे के।

Tuesday, March 20, 2012

दूर के ढोल

मैं पार्क में घूमने गया
दूर की घास हरी-भरी दिखाई दी
वहं पहुंचा तो वैसी नहीं थी
मन बैठने को नहीं हुआ
आगे की घास हरी-भरी लगी
यह सिलसिला चलता रहा
और वहीं बैठ गया अंतत:
हार थक कर मैं
जहां खड़ा था ,
खत्‍म हुआ इस तरह
मेरा वर्तुल भ्रमण -
मैं केंद्र से दूर
परिधि पर भटकता रहा
कस्‍तूरी की खोज में
हिरन बना हुआ 1
मरीचिकाएं
रेगिस्‍तान में ही नहीं होती
पूरी जिंदगी मे होती है
दूसरे की थाली में पड़ा खाना
ज्‍यादा और जायकेदार लगता है
पराये का दुख छोटा लगता है
पडोसी की बीबी सुंदर लगती है
वर्तमान से हमें घबराहट होती है
पिछली कक्षा आसान लगती है
अगली कक्षा का रोमांच होता है
अपनी आज की परीक्षा ही
हमें मुश्किल लगती है
जो नहीं है , रखता हे वो
उलझाए और बहलाए
हमारे मन को
ख्‍वाब और डर में
जिंदगी बीतती जाती है
वक्‍त गुजरता जाता है
हम चुकते जाते हैं
बाल सफेद होते जाते हैं
धूप में और छांव में ।

Friday, March 16, 2012

रानी और नौकरानी

शादी के पांच बरस बाद
पडोसिन को देखकर
अचानक
वह कैरियर- कांशस हो गई
आर्थिक आजादी की ललक में ,
ले लिया दाखिना उसने
बी. एड. के स्‍कूल में -
खुद पढ़ने लगी
घर में मेड रख ली
रोटी बनाने के लिए
कपड़े धोने के लिए ,
बच्‍चों को कैसे पढ़ाना है
सीख पाई या नहीं
मैं कह नहीं सकता
पर भूल गई वो
जीवन की असली पढाई
दूर होकर
अपनों से और
अपने घर से ,
अब नौकरी करने जायेगी
खुद के बच्‍चों को
किसी और मैडम से
ट्यूशन पढ़वायेगी !

Wednesday, March 14, 2012

बजट के मौके पर

सरकार की आर्थिक नीतियां
तय करती हैं कि
किसी की इनकम
कितनी कम हो
जिससे वह आ जाए
गरीबी रेखा के नीचे
इसी तरह
तय होनी चाहिए
अमीरी रेखा भी
जिसके ऊपर
कमाई करने वालों की
इनकम को
बांट देना चाहिए
गरीबों को ।
क्‍यूं मिनिमम डेली वेजेज
फिक्‍स किए जाते हें
सिर्फ मजदूरों के लिए
मैक्‍सीमम डेली वेजेज भी
फिक्‍स होने चाहिए
अफसरों के लिए
और सबको
उनके किए काम की
दिहाड़ी ही मिलनी चाहिए ,
हा‍थ के काम की कीमत
कितनी कम होनी चाहिए और क्‍यूं
दिमाग के काम की कीमत से !
समाज के सही अर्थतंत्र के लिए
पुश्‍तैनी और बपौती के ढांचे को ढहाना जरूरी है
दलालों और बिचौलियों का खात्‍मा जरूरी है
मुनाफाखोरी और लूट पर लगाम कसना जरूरी है ।

Tuesday, January 31, 2012

लेफ्ट - राइट - सेंटर

हम ,
भारत के लोग -
किसको चुनें
संविधान चलाने को ?
हाथी का कद छोटा है
हाथ काम नहीं करते
कमल कीचड़ में सना है
लालटेन में तेल नहीं है
दरांती की धार कमजोर है
साइकिल के टायर खराब हैं
तराजू के पलड़े विषम है
प्रतीकों में रखा क्‍या है !

Tuesday, January 10, 2012

हैप्‍पी बर्थ-डे

कहते हैं
मेरे माता-पिता ,
रिश्‍तेदार और सरकारी कागज कि
आया था मैं धरती पर
बयालीस साल पहले -
यानी हो गया मै आज
42 ईअर ओल्‍ड -
इतना बूढा़ और पुराना मॉडल ,
कोई पड़ाव-सा लगती है
हर बीतते वर्ष की
यह तारीख
दिलाती याद
मौत से कम हुई
दूरी की
फिर भी
जयंती जैसे उत्सव ही
दिला पाते हैं निजात हमें
जिंदगी की दौड़ और ऊब से
थोड़ी-बहुत ,
आखिर कोई मौका भी तो चाहिए
साथ उठने-बैठने का :
रोज तो नाच-गा नहीं सकते ,
यह जरूरी तो नहीं
सिर्फ बच्चे ही जन्म-दिन मनाएं
अपने बूढ़े माँ-बाप को हम
हमेशा बच्चे ही लगते हैं।

Friday, January 6, 2012

मां

कल रास्‍ते मे मुझे
मिला एक आदमी
हट्टा - कट्टा नौजवान
लेकिन चेहरे से परेशान ।
घबराया हुआ सहमा हुआ
मिट्टी में कुछ टटोल रहा था ,
इधर- उधर डोल रहा था
मन ही मन कुछ बोल रहा था ।
मैंने पूछा - कुछ गुम हो गया क्‍या
हाँ , बहुत ही कीमती चीज ।
रूपया पैसा ? नहीं
उससे भी कीमती चीज
सोना चांदी ? नहीं
उससे भी कीमती चीज
हीरे मोती ? नहीं
उससे भी कीमती चीज !
यह कीमती चीज क्‍या हो सकती है
सोच-सोच कर मैं हैरान थी , और
खोज- खोज कर वह परेशान था ।
मैने कहा –
कुछ तो बतलाओ
पहेलियां मत बुझाओ
वह बोला - कैसे बतलाऊं ?
मेरी तो जुबान ही सुन्‍न हो गई है क्‍योंकि
मेरे ही घर से मेरी मां गुम हो गई है ।
‘ मां ‘ का नाम सुनते ही
मैं स्‍तब्‍ध रह गई
मूर्ति की भांति वहीं
जमीन में गढ़ी रह गई ।
सचमुच मां तो बहुत ही अमूल्‍य है
इसका न कोई तुल्‍य है
मैने पूछा-
अब घर में और कौन कौन हैं ?
वह बोला -
मेरी सौतेली मां और स्‍वार्थी बहन-भाई
मेरे ही घर में इन्‍होंने
विदेशी औरत को जगह दिलाई
इतना ही नहीं - मेरी बूढ़ी मां की
खिल्‍ली भी उड़ाई ।
उसे तो बडों का आदर सम्‍मान ही नहीं
छोटों को भी you ( तुम ) और
बडों को भी you (तुम ) कहती है
मामा हो या चाचा , मौसी हो या बुआ
सभी को अंकल-आंटी कहती है
मेरी मां तो बहुत तहजीब वाली है
उसकी तो हर बात निराली है
छोटों को भी आप , बड़ों को भी आप कहती है
धनवान हो या फकीर , सबके साथ
मिलजुल कर रहती है
मैने कहा अच्‍छा अब यह तो बताओ
तुम्‍हारी मां दिखने में कैसी है
उसका नाम क्‍या है ? और
उसकी पहचान क्‍या है ?
वह बोला
मेरी मां भले ही बूढ़ी है , लेकिन
अभी भी खूबसूरत है ,
हिन्‍दोस्‍तान को उसकी बहुत ही जरूरत है
उसके माथे पे गोल बिन्‍दी है
वह हम सबकी राष्‍ट्रभाषा है और
उसका नाम हिन्‍दी है ।
( लक्षविन्‍दर जी की एक कविता जो अपने ब्‍लाग पर लिख रहा हूं पढ़वाने के लिए )

Tuesday, January 3, 2012

खुशनुमा नया कान

नये साल पर
आया मुझे संदेशा
दीपावली की शुभकामना का -
फारवर्ड और मेल- लिस्‍ट के
इस गतिमय युग में
किसे फुरसत है
यह देखने की कि
किसको भेज रहें हैं
मैसेज और क्‍यूं !
वही कापी बारम्‍बार
पढ़ कर हो गया बोर
भूल जाता मैं नाम देखकर
अपना मैसेज भेजा था उसे
या अब जवाब लिखना है ,
बजता रहा टूं- टूं
वो खिलौना
देर रात तक -
उसे चुप कराकर
मैं सो तो गया
फिर भी मुआ
वो कांपता रहा
रजाई में -
शायद
31 दिसम्‍बर की
ठंड से ।
हैप्‍पी न्‍यू ईअर !

Thursday, December 29, 2011

वो कब और कहां गई !

कल रात
न मैं सो पाया
न मैं रो पाया
मुझे अजीब-सा लगा
उसके दुनिया से
चले जाने की
खबर सुनकर
जिससे न की थी
मैने कभी कोई बात
बस जब से उसे देखा
वो कोमा में ही थी
ढाई साल से बंद
अस्‍पताल के एक कोने में -
गाड़ी की पिछली सीट से
सिर के बल
सड़क पर गिरने के बाद
किसी को बचाने की कोशिश में
ड्राइवर का संतुलन बिगड़ने से हुए
मामूली हादसे में
जो मौत का एक
बहाना और कारण बन गया ।

मैं जब भी अस्‍पताल जाता था
उसके कमरें में जरूर बैठता था
थोड़ी देर के लिए -
जो मुझको लगता था
सेघर्ष और पूजा स्‍थल की तरह
जहां जिंदगी और मौत जूझ रहीं थी ,
रोज की दौड़- धूप और उठा-पटक से
दूरस्‍थ होकर
मैं कुछ सोचने को
मजबूर हो जाता था वहां
जीवन की टेढी-मेढ़ी राहों का
गहरा एहसास करते हुए ।
कोई इलाज नहीं बचा था
डाक्‍टर कहते थे
क्‍भी भी होश आ सकता है उसे -
बस इसी उम्‍मीद पर
घडी की टिकटिक सुनते हुए
अंतहीन इंतजार किये जाते थे
घर वाले सब लोग ।
वो ढाई साल से घर नहीं आई
अस्‍पताल का कमरा ही
उसका मायका बन गया था
उसे विदा होना पड़ा यहीं से
कल रात
सच्‍ची ससुराल के लिए ।

Monday, December 26, 2011

उसकी याद में

राधिके ।
तू गयी कहॉं !
पता नहीं शायद तुझे भी
खो गयी है तू
जीवन की उलझनों में
उलझा के मुझे
अपनी याद में
खोने के लिए।
दिवस-रात्रि हर क्षण
मेरे साथ है -
तेरा ही स्‍वप्‍न
तेरा वो मुस्‍कराता चेहरा
तेरी वो मृदुल बातें
तेरी वो चंचल ऑंखें
लोग कहते हैं
पागल हो गया हूँ मैं ,
जानते नहीं वो
इस पागलपन में ही ज्ञान है
यही प्रेम का पागलखाना ही
वास्‍तविक विद्यालय है ।
न तो अँधेरा ही है
न ही प्रकाश है
यह शीत ऋतु की
उस कुहरे-भरी प्रभात जैसा है
जब सूर्य की एक किरण
बादलों से जूझती है
अपने अस्तित्‍व बचाने को
और दुनिया में
रौशनी फैलाने को !
अनिश्चिततओं से घिरे हुए
इस जीवनमय गगन में
जागृत है आशा फिर भी
आशा के साथ ,
कभी सोचता हूँ
यह नन्‍हीं आशा ही
जीवन का आधार है
और ईश्‍वर की
इस अलबेली सृष्टि का
मूल, भाव व सार है।
बस इतनी ही विनती है
हे ईश्‍वर
जगाए रखना
इस प्रेरणा-स्रोत को ,
इस ज्‍योति-पुँज को
ताकि बजाता रहूँ
मैं अपनी बांसुरी
तुझमें विलीन होने तक।

Wednesday, December 7, 2011

भोर का राग

चाँदनी अलसाई तारे थके-थके
अम्‍बर रंग बदलता मादक पवन बहे
चीड़ नीरवता को मुर्गा बाँग भरे
गंगा के तट पर ऋषि ध्यान धरे
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

फुदकती गिलहरी इधर-उधर
नाचता पंख फैलाये मोर
कोयल गाती अपना गीत
कूदते वानर चारों ओर
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

चमकती ओस की बूँद
हरी घास के कण पे
धड़कते शांत पेड़ के पत्ते
बहती हवा शनैः-शनैः
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

तोड़ती प्‍यारी पल्लवी पुष्प
गूँथती बालों में माला
घंटियाँ बजती मंदिर में
नहाती घाट पर बाला
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

आई जीवन की नई सुबह
नहीं किसी को भी फुरसत
विचरण करने को नभ में
हुए विहग घर से रूख्‍सत
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

चंदा जाता सूरज आता
वक्‍त चलता ही जाता
काश, रहा होता मन - जैसे
मधुकर लीन रहा गुंजन में
काश, बिखराता आनंद हृदय - जैसे
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

Monday, November 28, 2011

बदलाव की तकलीफ

काटता है
पहनने पर
नया जूता
पैरों को ,
महसूस होता हे
अजीब-सा
चलने में ।
फिर…..
पड़ जाती है
आदत
कुछ दिनों मे
इतनी कि
उन्‍हें उतारने का
मन नहीं करता !
एडजस्‍ट हो जाता है
थोड़ा पैर - थोड़ा जूता
सेट करते हुए चाल
फटने की हद तक
घिसते हैं
पुराने जूतों को ,
वो हमें चलातें है
हम उन्‍हें चलातें हैं !

Thursday, November 17, 2011

ग्‍यारह बजे की रस्‍म

लेते हैं हम
शपथ
हर साल
खास दिन पर
दो मिनट सीधे खड़े होकर
दोहराते हुए
कागज पर लिखे शब्‍द -
ईमानदार रहने की
सच बोलने की
शांति-सदभाव की
निडर रहने की
निष्‍पक्ष रहने की -
फिर……..
भूल जाते है
ऐन वक्‍त
इम्‍तहान आने पर
सब कसमें और वायदे
प्रैर्क्‍टीकलिटी की
देते हुए दुहाई ,
खुद को और खुदा को
धोखा देने का
बढिया और आसान
तरीका
मिल गया है
हमें ।

Monday, October 31, 2011

क्‍यू से क्‍वैशन

क्‍यू इतनी लंबी क्‍यूं है
क्‍यू में मैं क्‍यूं लगूं
काउंटर ज्‍यादा क्‍यूं नहीं हैं
कम्‍प्‍यूटर कम क्‍यूं हैं
लोग काम फुर्ती से क्‍यूं नहीं करते
प्रोपर सिस्‍टम क्‍यू नहीं बनता
टोकन डिस्‍प्‍ले क्‍यूं नही होता
इंतजार नहीं होता अब
आयेगा मेरा नम्‍बर कब !
क्‍यू में खुद खड़े होकर ही
अहसास होता है
सरकारी नियमों के
चक्रव्‍यूह में डलझे हुए
आम आदमी की
तकलीफ और दिक्‍कत का :
काम कहां होगा
काम कैसे होगा
काम कब होगा !


किसी को सब्र नहीं
उसूलों की कद्र नहीं
क्‍यू तोड़ने में
लोगो को आता है मजा
क्‍यूंकि नहीं मिलती उन्‍हें
इस गलती की सख्‍त सजा ,
बाइपास करने के लिए क्‍यू
कनैक्‍शन निकालते हैं
सेटिंग करते हैं
ऊपर से फोन कराते है
सिफारिश लगवाते हैं
एजेंट को ढूंढते है
बैक-डोर से अंदर जाते है
और फिर चढ़ाते हैं
तत्‍काली मेवा
सेवा की स्‍पीड
बढाने के लिए ।
सोचता हूं
ऐसा ही होता होगा
आगुंतकों के साथ
मेंरे ऑफिस मे भी ,
पब्लिक टायलेट की तरह
हर पब्लिक ऑफिस की
हालत बहुत गंदी है
सफाई बहुत जरूरी है
सवाल उठाना ही काफी नहीं
जवाब भी जरूरी है
जिम्‍मेदारी हम सबकी है
रिश्‍वत लेना भी गलत है
रिश्‍वत देना भी गलत है ।

Wednesday, August 24, 2011

अन्‍ना का सत्‍संग या सत्‍य का प्रयोग

देखकर अपनी आंखों से
सड़क पर उमड़े
जनसैलाब को
और सुनकर
क्रांति के स्‍वरों की गूंज
उठने लगा हे
मेरे भीतर भी ज्‍वार
उस मुहिम में
शामिल होने का
जिसे शुरू किया है
एक बूढे ने
छोड़कर खानापीना
व्‍यवस्‍था को बदलने की
जिद करते हुए ।

क्‍या और कब हासिल होगा
मुझे नहीं मालूम
बस :
उम्‍मीद जग गई है
आग सुलग गई है
मशाल जल गई है
मेरे दिल में :
यह जताने के लिए कि
मैं मुर्दा नहीं हूं
और
दे सकता हूं
कुछ तो
आहुति के तौर पर
इस सामाजिक महायज्ञ में ।

Thursday, August 4, 2011

दीपक तले अंधेरा

सुनकर खबर
अपने गांव के बगल में
बिजलीघर के बनने की
बहुत खुश हुए थे हम सब
इस उम्‍मीद में कि
जगमगाएगा
हमारा गांव भी ,
छिन गई हमसे
खेती की जमीन
बन गए हम मजदूर
नौकरी करने को मजबूर ,
बिजली पहले भी नहीं आती थी
बिजली आज भी नहीं आती है
पर पड़ोस में
बिजलीघर-कॉलोनी की
रोज रात की दिवाली
उदास कर देती है मुझे
लालटेन की रोशनी में
पढ़ने के
जख्‍म पर
नमक छिड़कते हुए ।

Thursday, July 21, 2011

अंतिम संस्‍कार

मेरी लाश अभी आयी है
शमशान घाट पर
एक लाश और आ रही है
दूजी अधजली है
तीसरी की राख ठंडी पड़ चुकी है
तैयारियां चल रही हैं
उस इंसानी जिस्‍म को फूँकने की-
जिसे हम अब तक रिश्‍तों से बुलाते थे
सभी इंतजार में हैं
अर्थी को चिता पर रखते
लकडियों से उस ढांचे को ढांकते
जिसमें कोई प्राण नहीं है अब
बदबू से बचाने को
सामग्री~घी~चंदन डालते
आग लगा देंगे हड्डियों के शरीर को
सर्व-धर्म समभाव के शमशान घाट पर
जहॉं एक ओंकार , हे राम और ओम~शांति लिखा है
क्‍या सत्‍य है ?
शायद कुछ भी नहीं
बस यूँ ही लोग खुद को भुलाने के लिए
मंत्र दोहराते हैं जनाजे की भीड में
नारे-स्‍लोगन की तरह-
'' राम नाम सत्‍य है ''
सत्‍य ?
वो था जो नाम से जाना जाता था
या यह है जिसे हम लाश कहते हैं उसकी
राम कहां से आ गया बीच में-
न कभी देखा, न सुना- उसे
और सब शव-यात्राओं में उसी को सत्‍य कहते हैं
मौत एक उत्‍सव है
अवसर- जहॉं हो जाती है मुलाकात
सब रिश्‍तेदारों से
जिन्‍हें वैसे तो फुरसत नहीं मिलती।
कोई पूछता है – क्‍या हुआ, कब हुआ
बताते-बताते थक चुका हूँ
मन होता है – कैसेट में रिकार्ड कर
उसको चला दिया करूँ
या उनसे सवाल करूँ-
'' तुम कर क्‍या सकते थे
या तुम कर क्‍या सकते हो। '"
औपचारिकताओं के इस काल में
मौत भी एक सूचना रह गई है
और वो अगर दूर कहीं हो
तो अखबार और टी.वी. में
गिनती~संख्‍या ही बस।
कितने मरे , कितने दबे.......
लो एक लाश और आ गई ।
गुजरती हुई लाश को देखकर
लोग किसको मत्‍था टेकते हैं -
परमात्‍मा को,
उस आत्‍मा को,
खुद की मौत के भविष्‍य को
या डर लगता है उन्‍हें
अपनी लाश का ।
लाशों की भी स्‍टेजज हैं :
नहा~धोकर तैयार होने वाली लाश
अर्थी से उतरती हुई लाश
चिता पर लेटी हुई लाश
लकडियों से दबी लाश
अधजली लाश
अंगारे छिटकाती लाश
राख में बदली हुई लाश
हडिडयां चुनी जा रही लाश।
खून, दूध, आंसू और
लाश की राख :
सब एक-से होते हैं -
हिन्‍दू के और मुसलमान के
आदमी के और औरत के
शहरी और गंवार वाले के-
बस उनकी मात्रा ज्‍यादा या कम होती है
उम्र, शरीर के अनुसार
किसकी शव-यात्रा में
कितनी जमात और बारात
इसका भी अभिमान
कौन किस अस्‍पताल में मरा
और कितना खर्च करने के बाद
(या आमदनी उन डाक्‍टरों को कराने के बाद )
कितनी बड़ी बीमारी से हुई मौत
सब खड़े हैं
लाश के इर्द-गिर्द
सुरक्षा के लिए
या साक्षी : निश्चित करते गवाह बने हुए
कि वह चला गया, जल गया
पूरी व्‍यवस्‍था है -
राख में कोई प्राण न रह जाए
भूत को फिर से उठाने के लिए ।
सेवा करते बच्‍चे और बूढ़े
लक‍ड़ी लगाते लाश में
कंधा देते अर्थी को
दक्षिणा दे रहा है सिरघुटा बेटा
चुटैया वाले पंडित को
जिसने सौंप दिया उसकी मॉं के
निर्जीव शरीर को आग में
: आखिर किसका पुण्‍य ?
और डोम के बारे मे-
उनका पेशा है
लाशें जलाना
जैसे कसाई का जानवर काटना
जैसे वेश्‍या का शरीर बेचना
संवेदना सभी की होती है
पेट की भूख ही सच होती है
सिर्फ मौत ही पक्‍का सच होती है ।