Tuesday, April 13, 2010

पेयर

दो पैर हैं मेरे
चप्‍पल एक
दूजी जन्‍म के समय ही
कहीं जा छिटकी
उसे तलाशने में ही
बीती जा रही है जिंदगी
आधे-अधूरे जीते हुए.
कभी मिलती-जुलती चप्‍पल देखने पर
उसे पहनने की कोशिश करता हूँ
तो पता लगता है
वो और किसी की थी
थोड़ी निराशा के बाबजूद
फिर जुट जाता हूँ खोज में,
पर अब ढूँढने-फेंकने के चक्‍कर से
इतना ऊब पुका हूँ
कि सोचता हूँ
दूजा पैर ही न होता
तो अप्‍छा था
कभी मन कहता है
नंगे पॉंव ही चल पडूँ
जिंदगी की टेढ़ी मेढ़ी राहों पर
उतारकर इस एक चप्‍पल को भी अपने
दोनों पैरों को लहूलुहान करने.
बैशाखी मुझे नहीं चाहिए
और हाथ में एक चप्‍पल
पकड़े रहने से
झूठी उम्‍मीद बनी रहेगी
चलो ! ऐसा करता हूँ
इस एक चप्‍पल को भी फेंक ही देता हूँ.
हकीकत तो यह है कि
सभी समझौते की चप्‍पल को ही
सही मानकर घिसट रहे हैं
क्‍योंकि नंगे पैर चलने की
उनमें हिम्‍मत नहीं है.

1 comment:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete