Saturday, April 10, 2010

इच्‍छा

तृष्‍णा बढ़ रही है
उमरिया घट रही है
चॉंदनी को तरसता है चकोर
आग जलती है
मन में अविरल
सागर की प्‍यास बुझती नहीं
जिंदगी बीती जाती है
ऐसे ही उम्‍मीद में
जान चली जाती है
पर तृष्‍णा नहीं जाती है

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर रचना । आभार

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