Tuesday, January 3, 2012

खुशनुमा नया कान

नये साल पर
आया मुझे संदेशा
दीपावली की शुभकामना का -
फारवर्ड और मेल- लिस्‍ट के
इस गतिमय युग में
किसे फुरसत है
यह देखने की कि
किसको भेज रहें हैं
मैसेज और क्‍यूं !
वही कापी बारम्‍बार
पढ़ कर हो गया बोर
भूल जाता मैं नाम देखकर
अपना मैसेज भेजा था उसे
या अब जवाब लिखना है ,
बजता रहा टूं- टूं
वो खिलौना
देर रात तक -
उसे चुप कराकर
मैं सो तो गया
फिर भी मुआ
वो कांपता रहा
रजाई में -
शायद
31 दिसम्‍बर की
ठंड से ।
हैप्‍पी न्‍यू ईअर !

Thursday, December 29, 2011

वो कब और कहां गई !

कल रात
न मैं सो पाया
न मैं रो पाया
मुझे अजीब-सा लगा
उसके दुनिया से
चले जाने की
खबर सुनकर
जिससे न की थी
मैने कभी कोई बात
बस जब से उसे देखा
वो कोमा में ही थी
ढाई साल से बंद
अस्‍पताल के एक कोने में -
गाड़ी की पिछली सीट से
सिर के बल
सड़क पर गिरने के बाद
किसी को बचाने की कोशिश में
ड्राइवर का संतुलन बिगड़ने से हुए
मामूली हादसे में
जो मौत का एक
बहाना और कारण बन गया ।

मैं जब भी अस्‍पताल जाता था
उसके कमरें में जरूर बैठता था
थोड़ी देर के लिए -
जो मुझको लगता था
सेघर्ष और पूजा स्‍थल की तरह
जहां जिंदगी और मौत जूझ रहीं थी ,
रोज की दौड़- धूप और उठा-पटक से
दूरस्‍थ होकर
मैं कुछ सोचने को
मजबूर हो जाता था वहां
जीवन की टेढी-मेढ़ी राहों का
गहरा एहसास करते हुए ।
कोई इलाज नहीं बचा था
डाक्‍टर कहते थे
क्‍भी भी होश आ सकता है उसे -
बस इसी उम्‍मीद पर
घडी की टिकटिक सुनते हुए
अंतहीन इंतजार किये जाते थे
घर वाले सब लोग ।
वो ढाई साल से घर नहीं आई
अस्‍पताल का कमरा ही
उसका मायका बन गया था
उसे विदा होना पड़ा यहीं से
कल रात
सच्‍ची ससुराल के लिए ।

Monday, December 26, 2011

उसकी याद में

राधिके ।
तू गयी कहॉं !
पता नहीं शायद तुझे भी
खो गयी है तू
जीवन की उलझनों में
उलझा के मुझे
अपनी याद में
खोने के लिए।
दिवस-रात्रि हर क्षण
मेरे साथ है -
तेरा ही स्‍वप्‍न
तेरा वो मुस्‍कराता चेहरा
तेरी वो मृदुल बातें
तेरी वो चंचल ऑंखें
लोग कहते हैं
पागल हो गया हूँ मैं ,
जानते नहीं वो
इस पागलपन में ही ज्ञान है
यही प्रेम का पागलखाना ही
वास्‍तविक विद्यालय है ।
न तो अँधेरा ही है
न ही प्रकाश है
यह शीत ऋतु की
उस कुहरे-भरी प्रभात जैसा है
जब सूर्य की एक किरण
बादलों से जूझती है
अपने अस्तित्‍व बचाने को
और दुनिया में
रौशनी फैलाने को !
अनिश्चिततओं से घिरे हुए
इस जीवनमय गगन में
जागृत है आशा फिर भी
आशा के साथ ,
कभी सोचता हूँ
यह नन्‍हीं आशा ही
जीवन का आधार है
और ईश्‍वर की
इस अलबेली सृष्टि का
मूल, भाव व सार है।
बस इतनी ही विनती है
हे ईश्‍वर
जगाए रखना
इस प्रेरणा-स्रोत को ,
इस ज्‍योति-पुँज को
ताकि बजाता रहूँ
मैं अपनी बांसुरी
तुझमें विलीन होने तक।

Wednesday, December 7, 2011

भोर का राग

चाँदनी अलसाई तारे थके-थके
अम्‍बर रंग बदलता मादक पवन बहे
चीड़ नीरवता को मुर्गा बाँग भरे
गंगा के तट पर ऋषि ध्यान धरे
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

फुदकती गिलहरी इधर-उधर
नाचता पंख फैलाये मोर
कोयल गाती अपना गीत
कूदते वानर चारों ओर
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

चमकती ओस की बूँद
हरी घास के कण पे
धड़कते शांत पेड़ के पत्ते
बहती हवा शनैः-शनैः
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

तोड़ती प्‍यारी पल्लवी पुष्प
गूँथती बालों में माला
घंटियाँ बजती मंदिर में
नहाती घाट पर बाला
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

आई जीवन की नई सुबह
नहीं किसी को भी फुरसत
विचरण करने को नभ में
हुए विहग घर से रूख्‍सत
मधुकर लीन रहा गुंजन में
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

चंदा जाता सूरज आता
वक्‍त चलता ही जाता
काश, रहा होता मन - जैसे
मधुकर लीन रहा गुंजन में
काश, बिखराता आनंद हृदय - जैसे
उषा बिखराती लाली मधुबन में।

Monday, November 28, 2011

बदलाव की तकलीफ

काटता है
पहनने पर
नया जूता
पैरों को ,
महसूस होता हे
अजीब-सा
चलने में ।
फिर…..
पड़ जाती है
आदत
कुछ दिनों मे
इतनी कि
उन्‍हें उतारने का
मन नहीं करता !
एडजस्‍ट हो जाता है
थोड़ा पैर - थोड़ा जूता
सेट करते हुए चाल
फटने की हद तक
घिसते हैं
पुराने जूतों को ,
वो हमें चलातें है
हम उन्‍हें चलातें हैं !

Thursday, November 17, 2011

ग्‍यारह बजे की रस्‍म

लेते हैं हम
शपथ
हर साल
खास दिन पर
दो मिनट सीधे खड़े होकर
दोहराते हुए
कागज पर लिखे शब्‍द -
ईमानदार रहने की
सच बोलने की
शांति-सदभाव की
निडर रहने की
निष्‍पक्ष रहने की -
फिर……..
भूल जाते है
ऐन वक्‍त
इम्‍तहान आने पर
सब कसमें और वायदे
प्रैर्क्‍टीकलिटी की
देते हुए दुहाई ,
खुद को और खुदा को
धोखा देने का
बढिया और आसान
तरीका
मिल गया है
हमें ।

Monday, October 31, 2011

क्‍यू से क्‍वैशन

क्‍यू इतनी लंबी क्‍यूं है
क्‍यू में मैं क्‍यूं लगूं
काउंटर ज्‍यादा क्‍यूं नहीं हैं
कम्‍प्‍यूटर कम क्‍यूं हैं
लोग काम फुर्ती से क्‍यूं नहीं करते
प्रोपर सिस्‍टम क्‍यू नहीं बनता
टोकन डिस्‍प्‍ले क्‍यूं नही होता
इंतजार नहीं होता अब
आयेगा मेरा नम्‍बर कब !
क्‍यू में खुद खड़े होकर ही
अहसास होता है
सरकारी नियमों के
चक्रव्‍यूह में डलझे हुए
आम आदमी की
तकलीफ और दिक्‍कत का :
काम कहां होगा
काम कैसे होगा
काम कब होगा !


किसी को सब्र नहीं
उसूलों की कद्र नहीं
क्‍यू तोड़ने में
लोगो को आता है मजा
क्‍यूंकि नहीं मिलती उन्‍हें
इस गलती की सख्‍त सजा ,
बाइपास करने के लिए क्‍यू
कनैक्‍शन निकालते हैं
सेटिंग करते हैं
ऊपर से फोन कराते है
सिफारिश लगवाते हैं
एजेंट को ढूंढते है
बैक-डोर से अंदर जाते है
और फिर चढ़ाते हैं
तत्‍काली मेवा
सेवा की स्‍पीड
बढाने के लिए ।
सोचता हूं
ऐसा ही होता होगा
आगुंतकों के साथ
मेंरे ऑफिस मे भी ,
पब्लिक टायलेट की तरह
हर पब्लिक ऑफिस की
हालत बहुत गंदी है
सफाई बहुत जरूरी है
सवाल उठाना ही काफी नहीं
जवाब भी जरूरी है
जिम्‍मेदारी हम सबकी है
रिश्‍वत लेना भी गलत है
रिश्‍वत देना भी गलत है ।