Thursday, March 21, 2013

हम पंडित हैं











पूजापाठ करते हैं हम
बड़े लोगों के घर 
संस्‍कृत के श्‍लोक पढ़ते हुए
जो न हमें समझ आते है
न उन्‍हें समझाने की जरूरत है  
बस कर्मकांड हो जाता है
आस्‍था के त्‍यौहार का
हमारे तोता-रटंत पाठ से
उनका घर शुद्ध हो जाता है
हमें मोटी दक्षिणा मिल जाती है ,
झुग्‍गी के बच्‍चों को प़ढाना
वाकई बहुत मुश्किल है
वे बहुत ऊधम मचाते हैं
अटपटे सवाल पूछते हैं  
रोज नहाते भी नहीं हैं
गंदे-फटे कपड़े पहनते है
वहां पढ़ाना भी फ्री पड़ेगा ,   
इसलिये हम
अफसरों के घर ही जाते हैं
शास्त्रों का पाठ करने के लिये
हम पक्‍के बनिये हैं !  

Friday, March 8, 2013

और-रत


मेरी मां भी वही करती थी
जो आज मेरी बहन करती है
रोटी पकाती है खाना खिलाती है
बर्तन मांजती है कपड़े धोती है
झाडू़ और पोंछा करती है
राशन का हिसाब रखती है
ज्‍यादातर घर में ही रहती है
इन घरेलू कामों को अक्‍सर
महिलायें ही करती हैं
चाहे अपने घर की या बाहर की
जिन्‍हें हम रख लेते हैं मेडसर्वेंट -
आम औरत की हालत वही हे ;
मेरी बेटी के लिये कुछ बदला जरूर है
वो को-एड स्‍कूल में पढ़ने जाती है
खुद ही स्‍कूटी पर बाजार चली जाती है
बस में भी सीटें आरक्षित तो होती ही हैं
महिलाओं  के लिये
चाहे उस पर बैठे रहें आदमी बेशर्म होकर
मोबाइल पर लड़कों से बात कर सकती है
कपड़ों पर अब पहले सी पाबंदी नहीं है
पर उसकी मां उसे समझाती रहती है -
कुछ घर का काम भी सीख ले बेटी
तुझे पराये घर जाना है
जो न जाने तुझे कैसा मिले
नौकरी के क्षेत्र भी सीमित ही हैं
मध्‍यमवर्गीय लड़की के लिये
स्‍टनो-नर्स-रिसेप्‍शन-आपरेटर 
औरत का एक खास दिन मनाकर  
हम उसे अहसास कराते हैं
मजदूर की तरह
जो मजबूर है जीने के लिये
गैरबराबरी के समाज में ;   
पार्टियों में लेडीस फर्स्‍ट कहकर
हम थोड़ा शालीन बन जाते है
पर घर में औरतों को
रोटी लास्‍ट में ही मिलती है
नुमाइश की चीज समझकर
चीफ गैस्‍ट को बुके स्‍त्री से ही दिलवाते हैं
वंदना की रस्‍म भी वही अदा करती है ,
जेंडर-बायस के आरोप से
बचने के लिये
किताब के शुरू में ही लिख देते है 
आदमी के आगे कोष्‍ठक लगाकर
इसका मतलब नारी भी समझा जाये ;   
घर के बहुत सारे काम तो
आदमी भी बखूबी कर सकते है
और उन्‍हें करने भी जरूर चाहियें
जैसे बच्‍चे की टट्टी धोना
चाय बनाना , खाना परोसना
कपडे इस्‍तरी करना -
तभी अहमियत महसूस होगी
हमें घर संभालने वाली की ।
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आधा है चन्‍द्रमा, रात आधी
आधी है अपनी आबादी
इस आधे-अधूरे जीवन में
हक है हमारा आजादी
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Friday, March 1, 2013

मार्च का तिगड़मी महीना













सता रही है किसी को
टैक्‍स बचाने की फिक्र 
सुनाई देता हर तरफ
सेल-टारगेट का जिक्र
कोई चालान काट jरहा है  
करते हुए ट्रैफिक को जाम
नींद उड़ गई बच्‍चों की भी
चल रहा है उनका एक्‍जाम
सबकी छुट्टी रद्द करते हुए  
सरकार लगी है जोर-शोर से
अपने बहीखाते पूरे करने में
यह क्‍लोजिंग महीना है
बैलेंसशीट और सीआर का ,
अगला साल शुरू होने को है  
1 अप्रैल से  
मूरख बनाने के लिये
आम आदमी और औरत को !

Wednesday, February 27, 2013

Say HELLO to my little friend






वह बहुत जिद्दी है
अक्‍सर रूठ जाता है
ग़ुस्सा भी हो जाता है
पर चंद मिनटों में
खुद ही मान जाता है
खिलौनों से खेलते हुए
खुले दिल से हंसता है
उसकी अपनी ही भाषा है
हू- भौं की आवाजें करता है
मैं समझ नहीं पाता
उसकी सारी बातें
पर खूब ऊर्जा मिलती है
उस नन्‍हें बालक से
वो मेरा नया दोस्‍ है
वह मुझे परखता नहीं हैं !



Friday, February 22, 2013

डिस- ज्‍वांइट फैमिली

हमारे परिवार में सिर्फ चार सदस्‍य हैं
हम सब अकेले अलग जगह रहते हैं
मेरा ऑफिस है राजधानी दिल्ली में
मैडम जी बुटीक चलाती हैं मुम्‍बई में
बेटी आईटी सेक्टर में है बंगलौर मै
बेटा एमबीए करता है कोलकता में
चारों दिशाओं पर है परिवारी कब्‍जा
सही चाहे आपस में गहरा जज्‍बा ,
हम मोबाइल- नेट पर ही जुड़ पाते हैं
टीवी पर एक ही सीरियल देखते हुए
रिमोट से ही डिनर साथ कर लेते हैं
अकेलापन हम सबको ही अखरता है
पर क्‍या करें फैमिली की खातिर ही
हमें अकेले अलग जगह रहना पड़ता है ;
किसी के पास वक्‍त नहीं कहानी सुनाने का
ही बच्‍चे अब किसी की कहानी सुनते हैं
सब अपने आप में मस्‍त और व्‍यस्‍त हैं
घर में कभी
जब इकठ्ठे हो भी जायें सभी
तो टीवी के रिमोट के लिये
लड़ाई ही होती है
इसलिये दूर से ही
सबका हालचाल पूछ लेते है
इस तरह हम जैसे तैसे
परिवार निभा लेते हैं
सोचकर अपने मन को
थोड़ा सुकून देते हुए कि
हालत तो अभी और खराब होगी
हर शख्‍स और भी अकेला होगा
किसी की बुआमौसी नहीं होगी
कोई मामाचाचा के बिना होगा



Thursday, February 21, 2013

संघर्ष के साथी

आज सुबह जब मैं दफ्तर पहुंचा
वर्कशाप के गेट पर भीड़ जुटी थी
सरकारी वर्करों की
जिनमें अक्‍सर पुरूष ही दिख रहे थे
नारे लग रहे थे जोरशोर से
हकों की मांग करते हुए
सिस्टम को गरियाते हुए -
पर दिहाड़ी पर घास काटने वाली औरतें
उसी गेट से अंदर काम पर जा रहीं थीं
उन्हें किसी ने नहीं रोका या समझाया
वो हड़ताल पर जाने का नहीं सोच सकती
क्‍यूंकि वे तो ठहरीं असंगठित और मजबूर
जो महंगाई की मार झेलते हैं
जिनके पेट कुछ भरे हों
वे ही और मांगते हैं ,
कोई आमरण अनशन पर बैठता है
खुद को मनवाने का इंतजार करते हुये
पर जब कोई आता नहीं बात करने
तो खुद ही तोड़ देता हे व्रत
फेससेविंग के लिये
छोटा समझौता करते हुए
मन को कुछ समझाते हुए  ,
कोई धरने पर बैठता है , कोई चीखता है
कहीं फेसबुकिया आंदोलन चलता है
लाउडस्‍पीकर पर चिल्‍लाने से  
दुकाने बंद करने  से -  गाडि़यां जलाने से
घुड़की और भौं- भौं से
कोई बात नहीं बनेगी
सरकारें बहुत बेशरम हैं
अब तो लड़ना होगा - अड़ना होगा
खिलाफत के जो हथियार भोथरे पड़ चुके
उनकी धार को पैना करना होगा 
 पर उनको साथ लेकर नहीं
जिनके पास खोने के लिये अभी बहुत कुछ है  :
प्रमोशन - सेलरी - पोस्टिंग और ट्रांसफर !


Friday, February 15, 2013

पीले चेहरे वालों का बसंत

सह लेंगे हम जैसे-तैसे
गरमी , बरसात और ठंड
अब तो बस हो जाये अंत
जुल्‍म का , शोषण का
चाहे न आये कभी बसंत 
इंतजार कब तक कोई कैसे करे  
मौसमी सरकार के बदलने का
समस्‍याएं जब हों इतनी ज्‍वलंत
सब कविता की कोरी कल्‍पनायें हैं
जमीन से कभी नहीं मिलता अनंत
अगर रोटी मिल जाये भूखे बच्‍चों को
तो वो ही दे देंगे हमें फूलों की सुगंध ।
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मौसम का चक्‍कर है कहीं गर्मी कहीं ठंड 
सबके जीवन में होते हैं तरह तरह के रंग
दुनिया खेल है द्वंद का कह गए साधु संत
सुख दुख जैसे आते जाते वैसे शीत बसंत
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