Wednesday, April 13, 2011

मन चंगा तो कठौती गंगा

करते नहीं कद्र अपने माता- पिता की / वृद्धाश्रम मे समाजसेवा करने जाते हैं / रखते हैं मेड-सर्वेंट अपने घर पर / गुरूद्वारे का फर्श रोज सुबह धोते हैं / जानते हैं अफ्रीकन एनीमल्‍स के बारे में / अपनी गली के कुत्‍तों को कब देखते हैं / अपने रिश्‍तेदारों का जिन्‍हें पता नहीं / फिल्‍मी सितारों के वो बर्थडे मनाते हैं/ झांकते नहीं मन के अंदर कभी / मंदिर मे पूजा करने बेनागा जाते हैं / समझते हैं घ्ररवाली को नौकरानी / पड़ोसिन को महारानी मानते हैं जमाना ही कुछ ऐसा है ! हाथी तो यूँ ही बदनाम है बेचारा / इंसान के दांत ही है – दिखने के कुछ और , खाने के कुछ और !

Friday, April 8, 2011

अन्‍न - ना

संसद की ओर / जाने वाली सड़क पर / उमड़ पड़ा है / जन-सैलाब / समर्थन में / उसके / जो बैठ गया है / अनशन पर / परिवर्तन की उम्‍मीद में / उनके खिलाफ / जिनके पास हैं यंत्र / पुलिस और कोर्ट के / चलाने के लिए / लोक का तंत्र , मंत्र जपने से / बात नहीं बनेगी / पर चुप रहने से / क्‍या बात बनेगी ! इसलिए ही / संघर्ष जारी है और / बढ़ता ही जा रहा है / कारवां / हर दिन / गुजरने के साथ । अब - धुँधली ही सही / सरकार के / ग्रहों की स्थिति / कुछ नजर आ रही है , केंद्र को / परिधि पर बैठे / आम लोगों से / कुछ डर लगने लगा है ।

Monday, April 4, 2011

यहीं खुशी यहीं गम

आई हूँ अपने मायके / घर में दो कमरे हैं / बीच मे दीवार – / एक में कराह रहे हैं वो / जिनकी हूँ मैं बेटी / पिछले महीने हुए एक्‍सीडेंट के / असहय दर्द से / गर्म दूध पीते हुए / दूजे में चीख रही है वो / जो है मेरी बेटी / शादी के नौ बरस बाद / जन्‍मी पहली संतान / किलकारियां भरती हुई /दूध पीने के लिए , धूप और छांव की / अजीब जिंदगी / जी रही हूँ मैं / बेटी और मां का / संयुक्‍त फर्ज / निभाते हुए !

Friday, April 1, 2011

परदेश का फरेब

मैं उसके गॉव गया वहां सब कुछ है पत्‍नी – घर - खेत - भैंस बस नौकरी नहीं है जिसे करने आ गया वो शहर सब कुछ छोड़कर प्रगति के अवसर ढूंढता हुआ, रहता है अब अकेला इस शहर के किसी छोटे-से कोने में रिक्‍शा ढोते हुए जूझता हुआ स्‍वयं से और समय से , हकीकत न जानने वाले गांव के सीधे लोग मानते हैं उसे विकसित और बन जाता है वह प्रेरणा स्रोत बेराजगार युवाओं के लिए । मै कनाडा तो नहीं गया पर लगा सका कुछ अनुमान फौरेन- माइग्रेशन का गांव के इस टूर से ।

Thursday, March 24, 2011

नेशनल गेम

कैच हुए
मैच में
सब चिपके टीवी से
सिक्‍स हुआ फिक्‍स ,
वो खेल रहे हैं
हम देख रहे हैं
आज फाइनल है
सब कुछ बंद है :
दफ्तर - दुकान - रिक्‍शे
देशप्रेम का जुनून है,
लोग कह रहे हैं
इंडिया आज जीतेगा
मैं कहता हूँ
भारत आज नहीं जीतेगा
इससे क्‍या मैं
देशद्रोही साबित हो जाता हूँ ?
जो बेहतर खेलेगा वो जीतेगा ,
खेल तो खेल है
जिंदगी भी वही जीतेगा
जो बेहतर जीयेगा ।

Tuesday, March 22, 2011

प्रभु ! आओ हमारी रक्षा करो

गरीब ब्राहृमण सुदामा और
अमीर गोपाल कृष्‍ण
पढ़ते थे
एक ही स्‍कूली- आश्रम में
कृष्‍ण ने रिजर्वेशन नहीं मांगा
वरन मदद की
अपने गरीब दोस्‍त की
उनमें कोई लड़ाई न थी
न ही वो लिखते थे सरनेम
शर्मा-यादव सरीखे,
अगड़े-पिछड़े के चक्‍कर में
अगर मिल जाता आरक्षण
उस वक्‍त
गरीब को
तो आज सारे ब्राहृमण भी
सुदामा रख लेते उपनाम
शर्मा की जगह
क्‍योंकि आज
सरकारी नौकरियां हैं केक
और हिस्‍से का परसेन्‍ट
तय कर रही है
जन्‍म - वंशावली ।

Thursday, March 17, 2011

जागते रहो

देखकर मेरी शक्‍ल
सड़क पर
नहीं पुकारा जाता मुझे
नाम से
हर कोई कहता है:
‘ बहादुर जरा इधर सुनो ‘

सब सोतें हैं
खर्राटे लेते हुए
मैं जागता हूँ
थामे हुए
इक हाथ में डंडा
दूजे में टार्च ।

फक्र है मुझे
अपनी बहादुर कौम पर
करती है जो चौकीदारी
बैंक की , दुकानों की
कॉलोनी और मकानों की ।

बस होती है तकलीफ मुझे
जब बुलाते हैं नेपाली कहकर
मेरे मालिक
इतने सालों तक
खिदमत करने के बावजूद
उनके देश में ,
और करते हैं पहला शक वो
मुझ पर
कोई चोरी हो जाने के बाद !

अब कोई चारा नहीं मेरे पास
सौंपा है दुनिया के रखवाले ने
जिम्‍मा रखवाली का , मुझको
निभाना है उसे खुशी-खुशी
ताउम्र गश्‍त लगाते हुए ।