शरीर पर सिम्पटम उभरने लगे हैं
उसे पता है
इस असाध्य बीमारी के बारे में-
वो कैंसर से पीडि़त है !
कैसे सपने आते होंगे उसको
रात में नींद उचटने पर
क्या होता होगा उसके मन में
अस्पताल में थिरेपी के दौरान
या हाल पूछे जाने पर
उसकी तबीयत का
सहकर्मियों द्वारा
सहानुभूति के तौर पर।
कभी सोचती हूँ
फांसी लगने की तारीख
तय हो जाए
और कैदी को बता दी जाए
तो वो कैसे जीता होगा ?
: पल-पल को
शिद्दत से या बेचैनी में
- काउंट डाउन की तरह।
उसे देखकर मुझे कष्ट होता है
मैं कुछ कह नहीं पाती
बस ममता में दुआ करती हूँ
बारगेन कर ले
मुझे उठाकर दुनिया से
हे ईश्वर !
मेरे बेटे को स्वस्थ कर दे।
Friday, July 9, 2010
Wednesday, July 7, 2010
जीवन-प्रभात
जा रही थी मैं
इक सुबह तड़के ही
अपनी छोटी बहन के साथ
टाइकांडो की प्रैक्टिस के लिए
कि अचानक
आ गिरा
हमारे सामने सड़क पर
इक घोंसला
अंडा फूटा
दिखी हमें इक नन्हीं जान,
आया दौड़ता हुआ
इक कुत्ता
हम सहम गए
न जाने उस निरीह पर
क्या बीती होगी उस वक्त
हमारी तो चीख निकल गई
मां अपने बच्चे को चांच में दबाकर
फुर्र हो गई ।
सब अपने अपने रास्ते चल दिए
- हम प्लेग्राउंड की ओर
- कुत्ता डस्टबिन की ओर
- चिड़ी आसमान की ओर
फूटा अंडा वहीं पड़ा रहा
प्रभात का सूरज उग चुका था ।
(Penned after listening a real-life experience of two little kids)
बिलासपुर का वो नागा बाबा
आज उसकी याद आ गयी
जब मैं पैदल ही चला
दफ्तर के लंबे सफर पर
मानसून की पहली बूंदाबांदी में।
वो बुडढा निकलता था
बारिश में घूमने
अलफ नंगा
पेड़ की टहनी को
बेंत बनाकर
मानो करता हो
चैलेंज - कुदरत को
उसे काई डर नहीं था ।
उसके पास कुछ नहीं था
न तन पर कपड़े
न सामान का झोला
न खाने की कटोरी,
किसी से वह
न कुछ बोलता
न कुछ मॉंगता
न कुछ इकठ्ठा करता
कुछ देने पर भी
बस अपनी जरूरत जितना रखता
और बाकी वापिस कर देता
वह सारे मौसम कुछ नहीं पहनता था।
कभी उदास या रोते हुए
मैंने उसे नहीं देखा
हॉं ! वह कभी-कभार हॅसता जरूर था
शायद दुनिया के पागलपन पर
जो उसको पागल समझती थी।
था उसके चेहरे पर
गजब का नूर
जो याद दिलाता था मुझे
ईसा के क्रूस की ,
सबके दुखों और पापों का बोझ
सहते हुए सहर्ष
वह संत था
मस्तमौला फकीर था ।
जब मैं पैदल ही चला
दफ्तर के लंबे सफर पर
मानसून की पहली बूंदाबांदी में।
वो बुडढा निकलता था
बारिश में घूमने
अलफ नंगा
पेड़ की टहनी को
बेंत बनाकर
मानो करता हो
चैलेंज - कुदरत को
उसे काई डर नहीं था ।
उसके पास कुछ नहीं था
न तन पर कपड़े
न सामान का झोला
न खाने की कटोरी,
किसी से वह
न कुछ बोलता
न कुछ मॉंगता
न कुछ इकठ्ठा करता
कुछ देने पर भी
बस अपनी जरूरत जितना रखता
और बाकी वापिस कर देता
वह सारे मौसम कुछ नहीं पहनता था।
कभी उदास या रोते हुए
मैंने उसे नहीं देखा
हॉं ! वह कभी-कभार हॅसता जरूर था
शायद दुनिया के पागलपन पर
जो उसको पागल समझती थी।
था उसके चेहरे पर
गजब का नूर
जो याद दिलाता था मुझे
ईसा के क्रूस की ,
सबके दुखों और पापों का बोझ
सहते हुए सहर्ष
वह संत था
मस्तमौला फकीर था ।
Friday, July 2, 2010
किस्तों में खुदकुशी
तुम खुदकुशी करने चले हो ?
डरपोक , बेशर्म , पागल : कहीं के !
क्या पाओगे मरकर ?
नरक में भी जगह नहीं मिलेगी ,
अरे ! इतनी मुश्किलों से
मानव-योनि मिली है
इसे यूँ न गँवाओ
संघर्ष का नाम ही जीवन है
जूझो-पिसो-घिसटो-भोगो
और करो इंतजार
उसके बुलावे का
कुदरती मौत मरो
अपनी पसंद की नहीं :
खुदकुशी घिनौना पाप है।
खैर !
मुश्किल भी है खुदकुशी करना
सोचना भले आसान हो
उसका क्षण और तरीका
पर तय तभी होता है
जब वक्त का बुलावा आता है :
-30वीं सालगिरह पर
-रिटायरमेंट के 20 दिन बाद
-फांसी लगाकर
-ट्रेन की पटरियों पर
-जहर खाकर
या नदी में कूदकर
मैं मानता हूँ
सोचना चाहिए जरूर
हर किसी को
खुदकुशी के बारे में
ताकि महसूस कर सकें
मौत को
जिंदा रहते ही
और कहीं डरते सहमते ही
न गुजर जाए जिंदगी
समझौतों और मोह माया के
प्रपंच में ।
किस्तों में खुदकुशी से
बेहतर है
लगाना छलांग
नौंवी मंजिल से
या फिर दौड़ते हुए
सागर की लहरों मे
समा जाना ।
डरपोक , बेशर्म , पागल : कहीं के !
क्या पाओगे मरकर ?
नरक में भी जगह नहीं मिलेगी ,
अरे ! इतनी मुश्किलों से
मानव-योनि मिली है
इसे यूँ न गँवाओ
संघर्ष का नाम ही जीवन है
जूझो-पिसो-घिसटो-भोगो
और करो इंतजार
उसके बुलावे का
कुदरती मौत मरो
अपनी पसंद की नहीं :
खुदकुशी घिनौना पाप है।
खैर !
मुश्किल भी है खुदकुशी करना
सोचना भले आसान हो
उसका क्षण और तरीका
पर तय तभी होता है
जब वक्त का बुलावा आता है :
-30वीं सालगिरह पर
-रिटायरमेंट के 20 दिन बाद
-फांसी लगाकर
-ट्रेन की पटरियों पर
-जहर खाकर
या नदी में कूदकर
मैं मानता हूँ
सोचना चाहिए जरूर
हर किसी को
खुदकुशी के बारे में
ताकि महसूस कर सकें
मौत को
जिंदा रहते ही
और कहीं डरते सहमते ही
न गुजर जाए जिंदगी
समझौतों और मोह माया के
प्रपंच में ।
किस्तों में खुदकुशी से
बेहतर है
लगाना छलांग
नौंवी मंजिल से
या फिर दौड़ते हुए
सागर की लहरों मे
समा जाना ।
Wednesday, June 30, 2010
शराब बुरी चीज है
इससे नशा होता है
दिमाग भी भ्रष्ट हो जाता है
कभी-कभार गम हल्का हो जाए
पर कहीं सिर बोझिल भी हो जाता है
कड़वाहट में खुद को विस्मृत कर
किसी दूसरा दुनिया में चले जाते हैं
भूल कर यथार्थ
सुरुर के स्वप्न-लोक में
डगमगाते पैर और हाथ
थक-कर बड़बड़ाते हुए
सो जाते हैं
नींद भी नहीं आती
बस सुध-बुध खोकर पड़े रहते हैं
ऑंखें मलते हुए उठते हैं जब
ग्लानि होती है -
अब नहीं पीएंगे
शाम आती है -
फिर वही दोस्त, वही बोतल
और वही बहाना -
''थोड़ी-सी---- बस थोड़ी-सी''
शराब पीने लगती है हमें
जिसे हमने पीना शुरु किया था – कभी।
दिमाग भी भ्रष्ट हो जाता है
कभी-कभार गम हल्का हो जाए
पर कहीं सिर बोझिल भी हो जाता है
कड़वाहट में खुद को विस्मृत कर
किसी दूसरा दुनिया में चले जाते हैं
भूल कर यथार्थ
सुरुर के स्वप्न-लोक में
डगमगाते पैर और हाथ
थक-कर बड़बड़ाते हुए
सो जाते हैं
नींद भी नहीं आती
बस सुध-बुध खोकर पड़े रहते हैं
ऑंखें मलते हुए उठते हैं जब
ग्लानि होती है -
अब नहीं पीएंगे
शाम आती है -
फिर वही दोस्त, वही बोतल
और वही बहाना -
''थोड़ी-सी---- बस थोड़ी-सी''
शराब पीने लगती है हमें
जिसे हमने पीना शुरु किया था – कभी।
Tuesday, June 29, 2010
कोल्हू के बैल और बछड़े
बच्चों का होम-वर्क
बीबी का हाउस-वर्क
साहब का आफिस-वर्क :
सभी मशीन बने हुए हैं
मोबाइल की क्लॉक से चलते
स्कूली प्रोजेक्ट बनाते
किचन मै और आफिस मै
सब घालमेल है
कैरियर और फैमिली मै
सबकी बनी रेल है।
जुटे हैं परिवार के
सारे लोग
समाज में अपना
कद बढ़ाने में
साथ रोटी नहीं खाते
साथ गप नहीं लड़ाते
हॉं….
देख लेते हैं
सासबहू जैसे सीरियल
साथ-साथ
और कर लेते है
सुबह का योगा
इडियट बॉक्स के सामने बैठकर
दिन-भर जिंदगी की
वर्कशाप मे खटने के लिए।
बीबी का हाउस-वर्क
साहब का आफिस-वर्क :
सभी मशीन बने हुए हैं
मोबाइल की क्लॉक से चलते
स्कूली प्रोजेक्ट बनाते
किचन मै और आफिस मै
सब घालमेल है
कैरियर और फैमिली मै
सबकी बनी रेल है।
जुटे हैं परिवार के
सारे लोग
समाज में अपना
कद बढ़ाने में
साथ रोटी नहीं खाते
साथ गप नहीं लड़ाते
हॉं….
देख लेते हैं
सासबहू जैसे सीरियल
साथ-साथ
और कर लेते है
सुबह का योगा
इडियट बॉक्स के सामने बैठकर
दिन-भर जिंदगी की
वर्कशाप मे खटने के लिए।
Monday, June 28, 2010
गर्मी बहुत है
नींद नहीं आती है
करवटें बदलते
रात गुजर जाती है
भीग जाता है तकिया
बालों की बूँदों से
पसीने में
फिर भी अधमुँदी आंखों में
जब आता है सपना
उस पड़ोस वाली झुग्गी का
जहां न बिजली है
न पंखा है
न पानी है,
तो मैं डरता हुआ
सो जाता हूँ
कहीं मेरे घर की
बत्ती-पानी भी
गुल न हो जाए।
करवटें बदलते
रात गुजर जाती है
भीग जाता है तकिया
बालों की बूँदों से
पसीने में
फिर भी अधमुँदी आंखों में
जब आता है सपना
उस पड़ोस वाली झुग्गी का
जहां न बिजली है
न पंखा है
न पानी है,
तो मैं डरता हुआ
सो जाता हूँ
कहीं मेरे घर की
बत्ती-पानी भी
गुल न हो जाए।
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