Thursday, February 25, 2010

इलाज

दर्द हुआ मेरे कान में
तो इधर-उधर भागा
जिसने जो नुस्‍खा बताया
वही अपनाया
उस दौरान लगता था
पूरे शरीर में मानो
कान ही हो सब कुछ।
कितने सारे टैस्‍ट कराते हैं
हम किसी रोग में
उसकी ठीक वजह
जानने के लिए
पर क्‍यूँ नहीं सोचते
वैसे ही संजीदगी से
गरीबी-भुखमरी की
खतरनाक बीमारियों के बारे मे
और वंचितों-उपेक्षितों को
सरकारी भीख की
मामूली मल्‍हमपट्टी लगाकर
टरका देते हैं
सड़क की धूल फाकने के लिए
किस्‍मत की खाक छानने के लिए।
डॉक्‍टर भी नही हैं
नर्सें भी नहीं हैं
बेबस रोगी-ही-रोगी दिखते हैं बस
सामाजिक महामारी फैली है चारों ओर
यह कैसा अस्‍पताल है !
यह कैसा सूरतेहाल है !

आस्‍था का विज्ञापन

ऐ भई !
भोर हो गई
नींद से जगो
डुगडुगी बज रही है
बाबा का मॉल खुला है
हर माल ले लो सिर्फ सौ रूपये में
अंजन आंखों के लिए
मंजन दांतों के लिए
तेल मसाज के लिए
चूरन हाजमे के लिए ।
हमारे बाबा ऑल-इन-वन हैं
गुरू-बापू-स्‍वामी-अम्‍मा
हरफनमौला और मस्‍तमौला-
बंदर के करतब सिखाते हैं
सस्‍ता लंगर खिलाते हैं
जनरल नॉलिज की अटपटी बातें बताते हैं
चटपटे जोक्‍स सुनाते हैं
सेहत के लिए खूब हँसाते हैं
और कभी-कभार जादू भी दिखाते हैं।
वे कमाल है
असंख्‍य श्री के सरनेम वाली
महान आत्‍मा हैं
उनमें कई आत्‍माएं हैं
दशानन की तरह
उनके कई मुखौटे हैं
सर्कस का मदारी
मंदिर का पुजारी
दुकान का पंसारी
धंधे का व्‍यापारी
…………
…………..
पर बरखुरदार , खबरदार !
मॉल के बाहर ही खड़े रहना
स्‍मॉल लोगों का
अंदर आना मना है
आज विशेष योग-कक्षा चल रही है
नेताओं और अभिनेताओं के लिए
डॉक्‍टर और इंजीनियरों के लिए।

Wednesday, February 24, 2010

हम छोड़ चलें हैं मेहफिल को

दो दोस्‍त थे
साथ – साथ खाते , बतियाते और रहते
वक्‍त गुजरा
दोनों अपने-अपने काम-काज में
व्‍यस्‍त हो गए
उसका ट्रांसफर हो गया
और उनकी जगहें बदल गईं ।
अभी भी उनकी बातचीत होती
वह थोड़ा जिद्दी थी या तो अब उससे
ठीक से बात न करती
या उसको चिढ़ाती
वह कोशिश करता रहता
टूटता- रूठता
पर खुद ही मान जाता !
पुरानी जगह वाले को
कोई और नया दोस्‍त
मिल गया था
खेल चल ही रहा था
तिकड़ी का
इतने में न जाने क्‍या हुआ
बिखर गई
नयी दोस्‍ती की खुशफहमी
अब वह पुराले दोस्‍त के पास
आना चाहती है
जो इस दुनिया से ही
उठ चुका है
काश !
जीते जी रिश्‍ते की कद्र की होती ।

Monday, February 22, 2010

मिशन का शमशान

शुरू होती है
कोई भी संस्‍था
किसी खास मकसद से
इक महत्‍वाकांक्षा होती है किसी की
सपना कुछ नया करने का
पर जैसे जैसे वक्‍त गुजरता है
उसकी अंर्तआत्‍मा से अहम
हो जाते हैं बाहरी कपड़े
कितनी शाखाएं विदेश में
मैम्‍बर्स में :
कितने इंजीनियर और कितने डॉक्‍टर
संख्‍या से संस्‍था का विकास ऑंकते हैं ।
संस्‍था को चलाना ही
मकसद हो जाता है
फाइनंस-फंड-हाउसकीपिंग
और स्‍टाफ-मीटिंग में
उलझ जाते हैं
कार्यक्रम रखने पड़ते हैं
अस्तित्‍व को बचाने के लिए
और खुद को साबित करने के लिए।
जब मूल संस्‍थापक
चला जाता है दुनिया छोड़कर
तो दिशा ही बदल जाती है
किताबों और फोटो में
सीमित हो जाती है संस्‍था
धीरे धीरे बिखर जाती है
घुटन भी जरूर होती होगी
भीतर के कुछ लोगों को
किंतु किसी राह पर
बहुत आगे निकल जाने के बाद
वापिस मुड़ने के लिए
मजबूत कलेजा चाहिए ।
नियमावली की जकड़न में
कट्टर -कैडर तो बन सकते है
पर सार्थक कुछ भी
नहीं किया जा सकता ।

विन-विन

न चिढ़ना है
न चिढ़ाना है,
न रोना है
न रूलाना है,
न हारना है
न हराना है,
न खुद डरना है ,
न किसी को डराना है.
जीतना है और जिताना है
हँसना है और हँसाना है
चलना है और चलाना है
जीना है और जिलाना है .

Friday, February 19, 2010

देख तमाशा इंडिया का

सरकार के सफेद हाथी
और जनता की चींटियों के
दरम्‍यान हुआ : इक फुटबाल मैच
हाथी ने बाल्टियां भरकर दाल पी
वह और मोटा हो गया
चींटी को मँहगाई की वजह से
इक चम्‍मच शक्‍कर भी
नसीब न हुई
और वह बेचारी दुबली हो गयी.
कॉमन आदमी की वैल्‍थ
और गरीब मजदूरों के खून से
सजे-सँवरे स्‍टेडियम मे
टीमों के उतरने से पहले ही
सबने मान लिया था-
जीतेगा तो हाथी ही
पर उन पिद्दी चीटियों ने
औकात सिखा दी
सूँड और कानों में घुसकर
हाथी को नानी याद दिला दी.
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खेल खेल की आड़ में , लूट सके जो लूट
स्‍टेशन पर रह जायेगा , रेल गई जो छूट
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कॉमन आदमी की वैल्‍थ
खेलेंगे हम कॉमन वैल्‍थ.
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शोर मचा है , बजेंगे ढोल
मैच मे हम , करेंगे गोल
दिल्‍ली की तू जय बोल
आम आदमी होगा गोल.
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जीतेगा भई जीतेगा
ठेकेदार जीतेगा
हारेगा भई हारेगा
कॉमन-मैन हारेगा.
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कलम की किलकारी

सड़क पर पैदल चलते हुए
किसी किताब को पढते हुए
कोई गीत सुनते हुए
नींद में सपना देखते हुए
या फिर यूँ ही उदास बैठे हुए
कोई बीज पड़ जाता है
अवचेतन मन में
और गर्भ ठहर जाता है.
न जाने कितना वक्‍त लगे
उसे पकने में
किंतु प्रसव पीड़ा गहरी हो जाए
तभी डिलीवरी होगी
और अपनी नवजात गुडि़या को
गोद मे पाकर ही
मुझे तृप्ति मिलेगी.
मेरी रचना चाहे
तुम्‍हें कविता न लगे
पर वो बहुत सुंदर है
और समझभरी भी,
क्‍योंकि उसे मैंने जन्‍मा है
अपनी कोख से
और उसका कोमल स्‍पर्श
महसूस किया है
रोम-रोम की गहराईयों तक
मैंने अपने भीतरण.
वो मेरा अहसास है
वो मेरा जज्‍बात है
वो मेरा हिस्‍सा है
वो मेरा किस्‍सा है.