Friday, July 1, 2011

सीखना - सिखाना

नर्सरी स्‍कूल की
नई-नवेली मैडम
लिखवा रही थी
नन्‍हें बच्‍चों से
कर्सिव राइटिंग में
अंग्रेजी के अल्‍फाबेट्स
डांटती हुई झुंझलाकर
’ क्‍यूं नहीं घुमा पाते
लाइन डस तरह
जैसे मैं बताती हूँ ’
मन हुआ कहूँ
उस शिक्षिका को :
जरा तुम भी
लिखकर तो देखो
उर्दू के हिज्‍जे :
किसी के लिए
बाएं हाथ का खेल
दूजे को
दाएं हाथ का खेल भी
नहीं लगता है ।

गुजर चुके हम
जिन कक्षाओं और परीक्षाओं से
वो हमें आसान लगते है
दूसरों को समझाते हुए ,
पर बहुत मुश्किल होता है
कुछ भी नया सीखना
जो हमें नहीं आता
चाहे रोटी पकाना
चाहे कपड़े धोना
चाहे साइकिल चलाना
या फिर
बच्‍चों जैसा
सच्‍चा बनना ।

Friday, June 3, 2011

संघर्ष

सच के लिए वही मर सकते हैं
सच के लिए वही लड़ सकते हैं
सच के लिए वही अड़ सकते हैं
जो सच बोलते हैं , सच सुनते हैं
जो सच जानते हैं , सच जीते हैं
सत्‍य के लिए आग्रह तो जरूरी है
पूर्वाग्रहों से मुक्ति भी हमें पानी है
सियासती खेल मत बनाना वरना
प्रदर्शन बन कर रह जाऐगा धरना !

Wednesday, June 1, 2011

सच की तह तक

छीलते हुए
प्‍याज की परतें
आ जाते हैं
आंखों में आंसू
धुंधलाते हुए उनको
कुछ देर के लिए
फिर पैनी हो जाती है
हमारी नजर
कचरा निकल जाने पर ,
खुद के केंद्र तक
पहुँचने के लिए भी
आवरण की परतों को
धीरे-धीरे ही सही
हटाना जरूरी है ।

Wednesday, April 13, 2011

मन चंगा तो कठौती गंगा

करते नहीं कद्र अपने माता- पिता की / वृद्धाश्रम मे समाजसेवा करने जाते हैं / रखते हैं मेड-सर्वेंट अपने घर पर / गुरूद्वारे का फर्श रोज सुबह धोते हैं / जानते हैं अफ्रीकन एनीमल्‍स के बारे में / अपनी गली के कुत्‍तों को कब देखते हैं / अपने रिश्‍तेदारों का जिन्‍हें पता नहीं / फिल्‍मी सितारों के वो बर्थडे मनाते हैं/ झांकते नहीं मन के अंदर कभी / मंदिर मे पूजा करने बेनागा जाते हैं / समझते हैं घ्ररवाली को नौकरानी / पड़ोसिन को महारानी मानते हैं जमाना ही कुछ ऐसा है ! हाथी तो यूँ ही बदनाम है बेचारा / इंसान के दांत ही है – दिखने के कुछ और , खाने के कुछ और !

Friday, April 8, 2011

अन्‍न - ना

संसद की ओर / जाने वाली सड़क पर / उमड़ पड़ा है / जन-सैलाब / समर्थन में / उसके / जो बैठ गया है / अनशन पर / परिवर्तन की उम्‍मीद में / उनके खिलाफ / जिनके पास हैं यंत्र / पुलिस और कोर्ट के / चलाने के लिए / लोक का तंत्र , मंत्र जपने से / बात नहीं बनेगी / पर चुप रहने से / क्‍या बात बनेगी ! इसलिए ही / संघर्ष जारी है और / बढ़ता ही जा रहा है / कारवां / हर दिन / गुजरने के साथ । अब - धुँधली ही सही / सरकार के / ग्रहों की स्थिति / कुछ नजर आ रही है , केंद्र को / परिधि पर बैठे / आम लोगों से / कुछ डर लगने लगा है ।

Monday, April 4, 2011

यहीं खुशी यहीं गम

आई हूँ अपने मायके / घर में दो कमरे हैं / बीच मे दीवार – / एक में कराह रहे हैं वो / जिनकी हूँ मैं बेटी / पिछले महीने हुए एक्‍सीडेंट के / असहय दर्द से / गर्म दूध पीते हुए / दूजे में चीख रही है वो / जो है मेरी बेटी / शादी के नौ बरस बाद / जन्‍मी पहली संतान / किलकारियां भरती हुई /दूध पीने के लिए , धूप और छांव की / अजीब जिंदगी / जी रही हूँ मैं / बेटी और मां का / संयुक्‍त फर्ज / निभाते हुए !

Friday, April 1, 2011

परदेश का फरेब

मैं उसके गॉव गया वहां सब कुछ है पत्‍नी – घर - खेत - भैंस बस नौकरी नहीं है जिसे करने आ गया वो शहर सब कुछ छोड़कर प्रगति के अवसर ढूंढता हुआ, रहता है अब अकेला इस शहर के किसी छोटे-से कोने में रिक्‍शा ढोते हुए जूझता हुआ स्‍वयं से और समय से , हकीकत न जानने वाले गांव के सीधे लोग मानते हैं उसे विकसित और बन जाता है वह प्रेरणा स्रोत बेराजगार युवाओं के लिए । मै कनाडा तो नहीं गया पर लगा सका कुछ अनुमान फौरेन- माइग्रेशन का गांव के इस टूर से ।