Monday, February 7, 2011

मां शारदे !

मेरे मन की वीणा को
संगीत के स्‍वरों से भर दो
विवेकी बना बुद्वि को
उसे श्‍वेत हंस जैसी कर दो
किताबे पढ़ता रहूं
कविताएं लिखता रहूं
ज्ञान की ज्‍योति जगाकर
स्‍व का मुझे सार दो
वाणी से गाता रहूं
तेरे ही गुण
ऐसा मुझे वर दो
करता रहूं सेवा हंसते हुए
उत्‍साह और ऊर्जा से
मुझको भर दो ।

Friday, February 4, 2011

बसंत - मिलन

झील के किनारे
पार्क में
रंग-बिरंगे और नाजुक
फूलों के बीच
अमुआ की डाली वाले
झूले में बैठी
पीताम्‍बरी साड़ी पहने : कल्‍पना
दिन के तीसरे पहर की
गुनगुनी धूप मे
सुनहरी सरसों को निहारती
गुनगुना रही थी
कोई गीत ,
मानो कर रही हो
अनुरोध गगन में
चहलकदमी करते हुए
कौए से
अपने प्रीतम को
बुला लाने का ।

ट्रेन की सीटी बजे
काफी वक्‍त गुजर चुका
हो गई डदास
सोच में डूबी
‘ क्‍या नहीं आए साजन
इस गाड़ी से भी ! ’
अचानक
मूंद ली आंखें उसकी
किसी ने
पीछे से आकर ,
और यथार्थ की
हथेलियों के
कोमल स्‍पर्श ने
कल्‍पना के इंतजार का
बस-अंत कर दिया
प्रेम की प्रकृति से
सौंदर्य- सुगंध का रस
बिखराते हुए
सब दिशाओं में ।

Thursday, February 3, 2011

मत ललचाओ जी !

थाली में जो है
वो तो खा लो
पेट भर जाएगा
काहे हर स्‍टॉल पर
दौड़त- फिरत हो
प्‍लेट ले कर ,
जैसे कोई रिपोर्ट देनी हो
अपने घर जाकर
कैसा बना था
दावत का खाना
या फ्री के डिनर की
पूरी कसर निकालनी है ,
अरे भई !
तनिक सब्र करो
अगडम-बगड़म ठूंस कर
पेट को वेस्‍टबिन मत बनाओ
हाजमे का कुछ तो खयाल रखो ।

Wednesday, February 2, 2011

पशु-पक्षी और इंसान

कल झील के किनारे
घूमते हुए
बत्‍तखों को देख
मैं दार्शनिक हो गया :
क्‍या यही भोग योनियां हैं !
‘अपना दर्द किसी को बता नहीं सकते
अपने मन की किसी को कह नहीं सकते
भूख लगने पर मनपसंद खा नहीं सकते ‘

लोग तो बस आते हैं
घूमने-टहलने
पाप कार्न और आटे की गोलियां
डालकर चले जाते हैं ,
किसी ने कभी सोचा
उनका क्‍या खाने को जी चाहता है !

मोबाइल के कैमरे से
फोटो खींचकर
उनसे रिश्‍ता बनेगा क्‍या ?
जिनकी उम्र भी नहीं जानते हम
और न ही उनके नाम
बस कह देते हैं
पड़ोसी को :
‘ झील मे दस सुदर डक्‍स है
बच्‍चों को साथ लेकर आप भी देखने जाना ‘ !

Monday, October 18, 2010

पहेली सुलझ गई

झील के किनारे खड़ा
डूबने की सोचता हुआ
जैसे ही वो थोड़ा नीचे उतरा
इक नन्‍हीं मीन
उसके बड़े पैरों में
उलझ गई
वो नीचे झुका और
मछली को हाथ मे उठाते हुए
दार्शनिक अंदाज में बोला
“ जा ! मैं तुझे जिंदगी बख्‍शता हूँ “
जैसे ही उसने मीन को
हवा में उछाला
जिजीविषा चीख उठी :
मछली जल की रानी है
जीवन उसका पानी है
हाथ लगाओ उर जायंगी
बाहर निकालो मर जायेगी
मन से निराश मैन को
मीन ने फलसफा दिया
सबके जीवन की कुछ खास वजह है
सबके लिए कुदरत में खास जगह है

और वो
मीठी धरती की
कसैली मिट्टी में
खेलने के लिए
फिर ऊपर आ गया।

अंधा कानून

सुनकर ऐतिहासिक फैसला
जमीन के बॅटवारे का
मुझे डर लगने लगा है
अपने घर मे रखी
किताबे और फोटो
देखते हुए ।
कुरान है , अंबेडकर हैं
गांधी हैं, रामायण है :
कितने टुकड़े कर देगी कोर्ट
मेरे छोटे से उस कमरे के
यदि मुझ पर मुकदमा
ठोक दिया मजहबियों ने
या फिर कर लेगी मुझे गिरफ्तार
पुलिस
गैरजमानती वारंट जारी करते हुए
मार्क्‍स-माओ के वैचारिक ग्रंथों की
लाल जिल्‍द को सबूत बनाकर
नक्‍सली का लेबुल लगाकर
और कोर्ट राष्‍ट्रहित में
पॉच हजार पृष्‍ठों का
ऐतिहासिक फैसला लिखकर
मुझे फांसी पर चढ़ा देगा !

Thursday, October 7, 2010

खबरदार ! बरखुरदार

क्‍यूँ भटकते हो
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर ?
सीधी राह पर चलो,
ओवरब्रिज पर चढ़कर
प्‍लेटफार्म पार करो
रेल की पटरियों को
क्रॉस करते हुए
क्‍यूँ डालते हो
अपनी जान
जोखिम में ?

नियमों को ठीक से
लागू करते हुए फाइल पर
सही फैसले लो
पक्षपात करने के लिए
तथ्‍यों को तोड़-मरोड़कर
क्‍यूँ लिखते हो ?
ऐक्‍सीडंट से बचने के लिए
मशीन और मानव की
व्‍यवस्थित सुरक्षा को
बाई-पास मत करो ।

कुंजी और गाइड पढ़कर
बोर्ड का एक्‍जाम तो
जैसे-तैसे पास कर लोगे
कम्‍पटीशन में क्‍या होगा ?
औरों को धोखा देकर
अपनी आंखों को धूल से
कब तक बचाओगे ?

शॉर्टकट के चक्‍कर मे
जीवन की नैसर्गिक लय को
कट-शॉर्ट मत करो
सावधान !
लेवल-क्रासिंग का गेट बंद है
ट्रेन आने वाली है ।