Wednesday, July 7, 2010

बिलासपुर का वो नागा बाबा

आज उसकी याद आ गयी
जब मैं पैदल ही चला
दफ्तर के लंबे सफर पर
मानसून की पहली बूंदाबांदी में।

वो बुडढा निकलता था
बारिश में घूमने
अलफ नंगा
पेड़ की टहनी को
बेंत बनाकर
मानो करता हो
चैलेंज - कुदरत को
उसे काई डर नहीं था ।

उसके पास कुछ नहीं था
न तन पर कपड़े
न सामान का झोला
न खाने की कटोरी,
किसी से वह
न कुछ बोलता
न कुछ मॉंगता
न कुछ इकठ्ठा करता
कुछ देने पर भी
बस अपनी जरूरत जितना रखता
और बाकी वापिस कर देता
वह सारे मौसम कुछ नहीं पहनता था।

कभी उदास या रोते हुए
मैंने उसे नहीं देखा
हॉं ! वह कभी-कभार हॅसता जरूर था
शायद दुनिया के पागलपन पर
जो उसको पागल समझती थी।

था उसके चेहरे पर
गजब का नूर
जो याद दिलाता था मुझे
ईसा के क्रूस की ,
सबके दुखों और पापों का बोझ
सहते हुए सहर्ष
वह संत था
मस्‍तमौला फकीर था ।

Friday, July 2, 2010

किस्‍तों में खुदकुशी

तुम खुदकुशी करने चले हो ?
डरपोक , बेशर्म , पागल : कहीं के !
क्‍या पाओगे मरकर ?
नरक में भी जगह नहीं मिलेगी ,
अरे ! इतनी मुश्किलों से
मानव-योनि मिली है
इसे यूँ न गँवाओ
संघर्ष का नाम ही जीवन है
जूझो-पिसो-घिसटो-भोगो
और करो इंतजार
उसके बुलावे का
कुदरती मौत मरो
अपनी पसंद की नहीं :
खुदकुशी घिनौना पाप है।

खैर !
मुश्किल भी है खुदकुशी करना
सोचना भले आसान हो
उसका क्षण और तरीका
पर तय तभी होता है
जब वक्‍त का बुलावा आता है :
-30वीं सालगिरह पर
-रिटायरमेंट के 20 दिन बाद
-फांसी लगाकर
-ट्रेन की पटरियों पर
-जहर खाकर
या नदी में कूदकर

मैं मानता हूँ
सोचना चाहिए जरूर
हर किसी को
खुदकुशी के बारे में
ताकि महसूस कर सकें
मौत को
जिंदा रहते ही
और कहीं डरते सहमते ही
न गुजर जाए जिंदगी
समझौतों और मोह माया के
प्रपंच में ।

किस्‍तों में खुदकुशी से
बेहतर है
लगाना छलांग
नौंवी मंजिल से
या फिर दौड़ते हुए
सागर की लहरों मे
समा जाना ।

Wednesday, June 30, 2010

शराब बुरी चीज है

इससे नशा होता है
दिमाग भी भ्रष्‍ट हो जाता है
कभी-कभार गम हल्‍का हो जाए
पर कहीं सिर बोझिल भी हो जाता है
कड़वाहट में खुद को विस्‍मृत कर
किसी दूसरा दुनिया में चले जाते हैं
भूल कर यथार्थ
सुरुर के स्‍वप्‍न-लोक में
डगमगाते पैर और हाथ
थक-कर बड़बड़ाते हुए
सो जाते हैं
नींद भी नहीं आती
बस सुध-बुध खोकर पड़े रहते हैं
ऑंखें मलते हुए उठते हैं जब
ग्‍लानि होती है -
अब नहीं पीएंगे
शाम आती है -
फिर वही दोस्‍त, वही बोतल
और वही बहाना -
''थोड़ी-सी---- बस थोड़ी-सी''
शराब पीने लगती है हमें
जिसे हमने पीना शुरु किया था – कभी।

Tuesday, June 29, 2010

कोल्‍हू के बैल और बछड़े

बच्‍चों का होम-वर्क
बीबी का हाउस-वर्क
साहब का आफिस-वर्क :
सभी मशीन बने हुए हैं
मोबाइल की क्‍लॉक से चलते
स्‍कूली प्रोजेक्‍ट बनाते
किचन मै और आफिस मै
सब घालमेल है
कैरियर और फैमिली मै
सबकी बनी रेल है।

जुटे हैं परिवार के
सारे लोग
समाज में अपना
कद बढ़ाने में
साथ रोटी नहीं खाते
साथ गप नहीं लड़ाते
हॉं….
देख लेते हैं
सासबहू जैसे सीरियल
साथ-साथ
और कर लेते है
सुबह का योगा
इडियट बॉक्‍स के सामने बैठकर
दिन-भर जिंदगी की
वर्कशाप मे खटने के लिए।

Monday, June 28, 2010

गर्मी बहुत है

नींद नहीं आती है
करवटें बदलते
रात गुजर जाती है
भीग जाता है तकिया
बालों की बूँदों से
पसीने में
फिर भी अधमुँदी आंखों में
जब आता है सपना
उस पड़ोस वाली झुग्‍गी का
जहां न बिजली है
न पंखा है
न पानी है,
तो मैं डरता हुआ
सो जाता हूँ
कहीं मेरे घर की
बत्‍ती-पानी भी
गुल न हो जाए।

Friday, June 4, 2010

चरवैति चरवैति

बैठे हुए छत की मुंडेर पर
या खिड़की पर
या फिर बाहर-पत्‍थर की बेंच पर
देखता हूँ मैं
आती-जाती गाडि़यों को
भागती-दौड़ती जिंदगानी में।
रिक्‍शें पर बैठी मोटी औरतें
और उन्‍हें खींचता दुर्बल-सा पुरूष
आकाश पर छितराये बादल
दूर ऊँचाई पर उड़ते कौए
तरह-तरह की आवाजें
झगड़ती पड़ोसिनें
साइरन की लंबी चीत्‍कार
लगता है जैसे यही सब कुछ
अंदर चल रहा हो मन मे
ट्रैफिक की तरह निरंतर
विचारों का जंजाल।
कितना कठिन है
साक्षी बनना
और ब्‍ैठना शांत
जब चारों तरफ कोलाहल हो
दुनियादारी की।
थककर शांति – यह तो मजबूरी है
यात्रा की जरूरत ही नहीं- यह मजबूती है।
जब शरीर हो कमजोर
तो मजबूती और मजबूरी
एक हो जाती है
कुछ समझ में नहीं आता
बैठ जाएं भीड़ मे
कुचलने के लिए
या दौड़ते रहें
निरर्थक और निरुद्देश्‍य।
छत की मुंडेर पर
या खिड़की पर बैठे
या बाहर पत्‍थर की बेंच पर से
देखना आती-जाती गाडि़यों को
भागती-दौड़ती जिंदगानी में
रिक्‍शें पर बैठी मोटी औरतें
और उन्‍हें खींचता दुर्बल-सा पुरूष
आकाश पर छितराये बादल
दूर ऊँचाई पर उड़ते कौए
तरह-तरह की आवाजें
झगड़ती पड़ोसिनें
साइरन की लंबी चीत्‍कार
जैसे यही सब कुछ अंदर चल रहा हो
ट्रैफिक की तरह निरंतर
विचारों का जंजाल
मन के भीतर।
साक्षी बनना कितना कठिन है
कैसे बैठें शांत
जब चारों तरफ कोलाहल हो
दुनियादारी की।
थककर शांति – यह तो मजबूरी है
यात्रा की जरूरत ही नहीं- यह मजबूती है।
जब शरीर हो कमजोर
तो मजबूती और मजबूरी
एक हो जाती है
कुछ समझ में नहीं आता
इस भाग-दौड़ में बैठ जायें- कुचलने के लिए
या दौड़ते रहें, निरर्थक और निरुद्देश्‍य।