बस में आज
मैंने एक सुंदर लड़की को देखा
मुझे ईर्ष्या हुई उसे देख
उसके उतरने का स्टैंड आया
वह उठी :
उसके एक पैर था
हाथ में थी बैसाखी
मैंने परमपिता का शुक्रिया किया
मेरे दो पैर हैं - सही सलामत।
मैं दुकान पर गया
मिठाई खरीदने
ब्रिकी करने वाले लड़के ने
मुझसे की मीठी बातें
बोला –
'' मुझे बात करना अच्छा लगता है
मैं देख नहीं सकता न, इसलिए।''
मैंने परमपिता का शुक्रिया किया
मेरी दो ऑंखे हैं - सही सलामत।
मैं बाजार में चलता रहा
एक बच्चा मिला
जो था गुमसुम
हमउम्र बच्चों की भीड़ के बीच
जो खेल रहे थे, शोर मचाते
'' क्यूँ नहीं खेलते तुम उनके साथ ''
वह देखता रहा, कुछ न बोला
मुझे पता चला
वह सुन नहीं सकता
मैंने परमपिता का शुक्रिया किया
मेरे दो कान है - सही सलामत ।
हे ईश्वर !
सब कुछ बिल्कुल सही है :
दोनों पैर, दोनों ऑंखें, दोनों कान
और वह सब
जो मुझें याद नहीं रहता
तुम्हारा दिया हुआ
शिकायत क्या करू
और तुझसे क्या मांगू
तूने दिया है मुझे
हैसियत से ज्यादा
धन्यवाद तुझे कोटि-कोटि।
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Thursday, May 20, 2010
Wednesday, February 10, 2010
अति का भला न बोलना
बहती हुई नदी के किनारे
टहलते हुए मन खुश होता है
जीवन के प्रवाह को
उसमें देखता हुआ ,
उफनती हुई नदी से डर लगता है
और सूखी हुई नदी तो मन को
उदासी में ही धकेल देती है
उत्साह , भय और निराशा के
इन आयामों कव खुद में समेटे
यह वही नदी .
सृष्टि के तत्वों में संतुलन
बहुत जरुरी है
इनके अति-रूपों से
घबराहट होती है
बाढ़ हो या रेगिस्तान
ज्वालामुखी हो या तूफ़ान .
सौम्यता का आधार है
समता और सरलता
संगीत के लिए
वाद्य-यन्त्र के तारों की
मर्यादा जरुरी है .
बीच का रास्ता
समझौता नहीं
समझ का प्रतीक है
कुछ भी नहीं और
सब कुछ के
मध्य ही
यह सुन्दर संसार है .
टहलते हुए मन खुश होता है
जीवन के प्रवाह को
उसमें देखता हुआ ,
उफनती हुई नदी से डर लगता है
और सूखी हुई नदी तो मन को
उदासी में ही धकेल देती है
उत्साह , भय और निराशा के
इन आयामों कव खुद में समेटे
यह वही नदी .
सृष्टि के तत्वों में संतुलन
बहुत जरुरी है
इनके अति-रूपों से
घबराहट होती है
बाढ़ हो या रेगिस्तान
ज्वालामुखी हो या तूफ़ान .
सौम्यता का आधार है
समता और सरलता
संगीत के लिए
वाद्य-यन्त्र के तारों की
मर्यादा जरुरी है .
बीच का रास्ता
समझौता नहीं
समझ का प्रतीक है
कुछ भी नहीं और
सब कुछ के
मध्य ही
यह सुन्दर संसार है .
Friday, February 5, 2010
गुरु-सिख
मेरी लम्बी दाढ़ी देखकर
बच्चे मुझे बाबा कहते हैं
बड़े ज्ञानी और
सब मुझे बुज़ुर्ग समझते हैं.
टोकते हैं मजहबी ठेकेदार
मुझे पगड़ी न पहनने पर
कोसते हैं एनजीओ वाले समाजसेवी दोस्त
सरकारी नौकरी में होने पर और
ऑफिस वाले सहकर्मी
उनसे अलग सोच रखने पर.
भेड़ों की भीड़ में
शामिल नहीं होना मुझे और
न ही हांका जाना चाहता हूँ
कर्म-कांडी डंडों से .
विस्तृत गगन में आज़ाद परिंदे की तरह
उड़ना है मुझे
फ्रेम और संस्थाओं की कैद से
मुक्ति चाहिए मुझे
सीखते हुए खुद ही की रौशनी में
अंधेरों से जूझना है मुझे.
बच्चे मुझे बाबा कहते हैं
बड़े ज्ञानी और
सब मुझे बुज़ुर्ग समझते हैं.
टोकते हैं मजहबी ठेकेदार
मुझे पगड़ी न पहनने पर
कोसते हैं एनजीओ वाले समाजसेवी दोस्त
सरकारी नौकरी में होने पर और
ऑफिस वाले सहकर्मी
उनसे अलग सोच रखने पर.
भेड़ों की भीड़ में
शामिल नहीं होना मुझे और
न ही हांका जाना चाहता हूँ
कर्म-कांडी डंडों से .
विस्तृत गगन में आज़ाद परिंदे की तरह
उड़ना है मुझे
फ्रेम और संस्थाओं की कैद से
मुक्ति चाहिए मुझे
सीखते हुए खुद ही की रौशनी में
अंधेरों से जूझना है मुझे.
Wednesday, February 3, 2010
हम भी हैं
लोग मेरा सरनेम पूछते हैं या
फिर टटोलकर बायोडाटा
मेरी कैटेगरी जानना चाहते हैं
मुझे असुरक्षित महसूस कराने के लिए
आरक्षित होने के कारण
उनकी नज़रों में खटकता हूँ
जैसे कोई अपराधी हूँ मैं
उनकी जन्म-सिद्ध अधिकार की
रोटी का हिस्सा छीनता
अपने विशेषाधिकार से
क्या सर जमीन पर रगड़ने से
तुम चल सकते हो ?
और छाती -जांघ से तो तुम
चलने की सोच भी नहीं सकते ,
अपने दिमाग और दिल का इलाज कराओ
जो अहम् के नशे में ख़राब हो चुके हैं
हम हाथ-पाँव हैं समाजी-शरीर के
पैरों की बदौलत ही टिका पाते हो
अपना बोझ धरती पर और
हाथ से ही कौर दाल पाते हो रोटी की
जिसकी भूख हमें भी है
जिंदा रहने के लिए
टहलने-दौड़ने के लिए
हमें भी मजबूत रखो
समाज को लूला-लंगड़ा मत बनाओ
हमारा नाम मत पूछो
नाम में क्या रखा है
काम देखो
फिर टटोलकर बायोडाटा
मेरी कैटेगरी जानना चाहते हैं
मुझे असुरक्षित महसूस कराने के लिए
आरक्षित होने के कारण
उनकी नज़रों में खटकता हूँ
जैसे कोई अपराधी हूँ मैं
उनकी जन्म-सिद्ध अधिकार की
रोटी का हिस्सा छीनता
अपने विशेषाधिकार से
क्या सर जमीन पर रगड़ने से
तुम चल सकते हो ?
और छाती -जांघ से तो तुम
चलने की सोच भी नहीं सकते ,
अपने दिमाग और दिल का इलाज कराओ
जो अहम् के नशे में ख़राब हो चुके हैं
हम हाथ-पाँव हैं समाजी-शरीर के
पैरों की बदौलत ही टिका पाते हो
अपना बोझ धरती पर और
हाथ से ही कौर दाल पाते हो रोटी की
जिसकी भूख हमें भी है
जिंदा रहने के लिए
टहलने-दौड़ने के लिए
हमें भी मजबूत रखो
समाज को लूला-लंगड़ा मत बनाओ
हमारा नाम मत पूछो
नाम में क्या रखा है
काम देखो
Tuesday, February 2, 2010
अपने ही दुश्मन
मैं खड़ा था जूस की दुकान पर
एक दोस्त के साथ
दो गिलास बनाने का आर्डर देकर
पीछे से एक बुढ़िया आई
और चंद सिक्कों के लिए हाथ फैलाये
मैंने उससे पूछा जूस पियोगी
और उसके चेहरे पर ख़ुशी देखकर
तीसरे गिलास के लिए कहा
तो दुकान पर तैनात मजदूर ने
( वो मालिक तो कतई नहीं था )
नफरत की नज़र से देखा
क्यों होता है ऐसा वर्ग-संघर्ष
उन्हीं के बीच –
बेटे जनने के लिए
बहू को कोसती सास ,
मेकडोनाल्ड के गेट पर
अन्दर जाने से मुझे रोकता
मेरे कपड़ों को देखकर ,
अंग्रेजी किताबों के स्टाल पर खड़ा
हिंदी ही पढ़ सकने वाला सेल्स- बॉय
मेरे चेहरे को देखकर कहता
मन ही मन
" ये इंग्लिश की किताबें हैं "
एक दोस्त के साथ
दो गिलास बनाने का आर्डर देकर
पीछे से एक बुढ़िया आई
और चंद सिक्कों के लिए हाथ फैलाये
मैंने उससे पूछा जूस पियोगी
और उसके चेहरे पर ख़ुशी देखकर
तीसरे गिलास के लिए कहा
तो दुकान पर तैनात मजदूर ने
( वो मालिक तो कतई नहीं था )
नफरत की नज़र से देखा
क्यों होता है ऐसा वर्ग-संघर्ष
उन्हीं के बीच –
बेटे जनने के लिए
बहू को कोसती सास ,
मेकडोनाल्ड के गेट पर
अन्दर जाने से मुझे रोकता
मेरे कपड़ों को देखकर ,
अंग्रेजी किताबों के स्टाल पर खड़ा
हिंदी ही पढ़ सकने वाला सेल्स- बॉय
मेरे चेहरे को देखकर कहता
मन ही मन
" ये इंग्लिश की किताबें हैं "
Monday, February 1, 2010
बिक्री-घर
अफसर की कोठी
रंडी का कोठा
एक जगह जमीर बिकता है
दूजी जगह शारीर
दलाल भी दोनों जगह हैं
नाच दोनों जगह चलता है
मेक अप और मास्क के पीछे
खरीददारों के लिए
अफसर में कोई अल्हड लावण्य नहीं
उसके पास कोई बिस्तर भी नहीं
बस कुर्सी और कलम का कमाल है
कोठा कोठी से बड़ा है
वहां पेशा ईमानदारी से चलता है
पर कोठी का दाम बढ़ता जा रहा है
और कोठे को पुलिस वाले बंद कराते जा रहे हैं
रंडी का कोठा
एक जगह जमीर बिकता है
दूजी जगह शारीर
दलाल भी दोनों जगह हैं
नाच दोनों जगह चलता है
मेक अप और मास्क के पीछे
खरीददारों के लिए
अफसर में कोई अल्हड लावण्य नहीं
उसके पास कोई बिस्तर भी नहीं
बस कुर्सी और कलम का कमाल है
कोठा कोठी से बड़ा है
वहां पेशा ईमानदारी से चलता है
पर कोठी का दाम बढ़ता जा रहा है
और कोठे को पुलिस वाले बंद कराते जा रहे हैं
Sunday, January 31, 2010
अमी गांधी बोल्छे
जब मैं जिंदा था
अपने अन्दर की आवाज़ सुनकर-
वही लिखता था
वही करता था
वही कहता था -
जो मुझे उस वक़्त
सच और ठीक लगता था
आज मैं सुनता हूँ
बाहर की आवाजें
जिन्होनें मुझे या तो भगवान बना दिया है
गीता हाथ में पकड़ाकर
महात्मा और बापू से नवाज़ा हुआ
लाठी-चश्मे का बुत
या फिर शैतान
इतिहास की हर घटना के लिए ज़िम्मेदार -
भगत सिंह की फांसी
अम्बेडकर का समझौता
बोस की खिलाफत
जिन्ना का तुष्टीकरण
नेहरु को गद्दी-
हाँ, मैं थोडा जिद्दी जरूर था
पर गुंडा नहीं
जो मेरे नाम के आगे
गिरी,गर्दी या बाज़ी लगाकर
मुझे बना दिया
मुन्ना मोहन से तुमने
गाड से मुझे विशेष प्रेम था
इसलिए ही शायद गोडसे ने ही
मुझसे “ हे राम “ कहलवाया
मैं दोषी हूँ
हरिलाल और मनु-बेन
तुम पर प्रयोग करने का
मुझे माफ़ करो
मैं साधारण इंसान था
तुमने मुझे महात्मा बना दिया
न मुझे राजपाट की लालसा थी
न ही मुझे राजघाट चाहिए
न मेरी वजह से आज़ादी बदली
न ही मेरी वजह से दुनिया बदलेगी
मुझे मत घसीटो
संस्थाओं , तुलना और बहसों में
मेरे नाम को मत भुनाओ
मैंने वही किया
जो मुझे जंचा
तुम वही करो
जो तुम्हें जंचे
हर एक का अपना सच होता है
हर एक का अपना पथ होता है
बस लोकतंत्र में अपनी ज़िम्मेदारी समझो
ईमानदार इंसान बनो
मुझे पढ़कर चर्चा करने से क्या होगा ?
बन्दर ३ या ५ हो सकते थे
व्रत भी नौ ग्यारह या तेरह
कोई फरक नहीं पड़ता
लकीर मत पीटो
अपना सच तलाशो
इस बात का कोई मतलब नहीं
मैं होता तो इस कम्प्यूटर -युग में
क्या इन्टरनेट यूज करता ?
अहम् यह है कि तुम
जो अभी जिंदा हो
क्या करते हो ?
खुद को मुझसे सही या
मुझे आज गलत ठहराकर
तुम कुछ नहीं पाओगे
अपने आप से भागकर कहाँ जाओगे ?
तुम निश्चिन्त रहो
मैं दोबारा नहीं आऊंगा
और इतिहास शायद दोहराता भी नहीं
खुद को हूबहू
उसी ईसा,बुद्ध,नानक या फिर मुझे
देखकर धरती पर
तुम्हें भगवान से ज्यादा
भूत पर यकीन हो जायेगा
और सृष्टि की अनंतता से
यकीन उठ जायेगा
मैं तो अपना जीवन जी कर
जा चुका बरसों पहले
मेरे जैसे बनने की कोशिश मत करो
कोई किसी की कार्बन-कॉपी नहीं होता
अपने दीपक खुद बनो
एकला चलो
मुझे कब्र से बाहर मत निकालो
मुझे चैन से रहने दो
कोई सच अंतिम नहीं होता
यह व्यक्ति और वक़्त के साथ बदलता रहता है
अपने अन्दर की आवाज़ सुनकर-
वही लिखता था
वही करता था
वही कहता था -
जो मुझे उस वक़्त
सच और ठीक लगता था
आज मैं सुनता हूँ
बाहर की आवाजें
जिन्होनें मुझे या तो भगवान बना दिया है
गीता हाथ में पकड़ाकर
महात्मा और बापू से नवाज़ा हुआ
लाठी-चश्मे का बुत
या फिर शैतान
इतिहास की हर घटना के लिए ज़िम्मेदार -
भगत सिंह की फांसी
अम्बेडकर का समझौता
बोस की खिलाफत
जिन्ना का तुष्टीकरण
नेहरु को गद्दी-
हाँ, मैं थोडा जिद्दी जरूर था
पर गुंडा नहीं
जो मेरे नाम के आगे
गिरी,गर्दी या बाज़ी लगाकर
मुझे बना दिया
मुन्ना मोहन से तुमने
गाड से मुझे विशेष प्रेम था
इसलिए ही शायद गोडसे ने ही
मुझसे “ हे राम “ कहलवाया
मैं दोषी हूँ
हरिलाल और मनु-बेन
तुम पर प्रयोग करने का
मुझे माफ़ करो
मैं साधारण इंसान था
तुमने मुझे महात्मा बना दिया
न मुझे राजपाट की लालसा थी
न ही मुझे राजघाट चाहिए
न मेरी वजह से आज़ादी बदली
न ही मेरी वजह से दुनिया बदलेगी
मुझे मत घसीटो
संस्थाओं , तुलना और बहसों में
मेरे नाम को मत भुनाओ
मैंने वही किया
जो मुझे जंचा
तुम वही करो
जो तुम्हें जंचे
हर एक का अपना सच होता है
हर एक का अपना पथ होता है
बस लोकतंत्र में अपनी ज़िम्मेदारी समझो
ईमानदार इंसान बनो
मुझे पढ़कर चर्चा करने से क्या होगा ?
बन्दर ३ या ५ हो सकते थे
व्रत भी नौ ग्यारह या तेरह
कोई फरक नहीं पड़ता
लकीर मत पीटो
अपना सच तलाशो
इस बात का कोई मतलब नहीं
मैं होता तो इस कम्प्यूटर -युग में
क्या इन्टरनेट यूज करता ?
अहम् यह है कि तुम
जो अभी जिंदा हो
क्या करते हो ?
खुद को मुझसे सही या
मुझे आज गलत ठहराकर
तुम कुछ नहीं पाओगे
अपने आप से भागकर कहाँ जाओगे ?
तुम निश्चिन्त रहो
मैं दोबारा नहीं आऊंगा
और इतिहास शायद दोहराता भी नहीं
खुद को हूबहू
उसी ईसा,बुद्ध,नानक या फिर मुझे
देखकर धरती पर
तुम्हें भगवान से ज्यादा
भूत पर यकीन हो जायेगा
और सृष्टि की अनंतता से
यकीन उठ जायेगा
मैं तो अपना जीवन जी कर
जा चुका बरसों पहले
मेरे जैसे बनने की कोशिश मत करो
कोई किसी की कार्बन-कॉपी नहीं होता
अपने दीपक खुद बनो
एकला चलो
मुझे कब्र से बाहर मत निकालो
मुझे चैन से रहने दो
कोई सच अंतिम नहीं होता
यह व्यक्ति और वक़्त के साथ बदलता रहता है
Friday, January 15, 2010
यूनिफार्म
एक-सी वर्दी पहने हुए
सड़क पर मार्च करती भीड़ के लोगों से
मुझे डर लगता है।
चाहे वह केसरिया वाले साधु हों
चाहे आर्मी के जवान
चाहे श्वेत साड़ी वाली बहनें
चाहे ईद पर जा रहे नमाजी
या फिर खादी वाले गांधीवादी।
न जाने कब जुनून सवार हो जाए
औरों की शामत आ जाए।
यूनिफार्म व्यक्तित्व का हनन है
और इंसान की नुमाईश
बस यह स्कूली बच्चों के
लोक नृत्य में ही अच्छी लगती है।
अभी रंग-बिरंगे गंदे
और मटमैले कपड़े वाले
लोग दिखे हैं
जो रिक्शे चला रहे हैं
जो चाय बना रहे हैं
और गुब्बारे बेच रहे हैं
तभी तो हौंसला बना है मुझमें
भीड़ की विपरीत दिशा में चलने का।
सड़क पर मार्च करती भीड़ के लोगों से
मुझे डर लगता है।
चाहे वह केसरिया वाले साधु हों
चाहे आर्मी के जवान
चाहे श्वेत साड़ी वाली बहनें
चाहे ईद पर जा रहे नमाजी
या फिर खादी वाले गांधीवादी।
न जाने कब जुनून सवार हो जाए
औरों की शामत आ जाए।
यूनिफार्म व्यक्तित्व का हनन है
और इंसान की नुमाईश
बस यह स्कूली बच्चों के
लोक नृत्य में ही अच्छी लगती है।
अभी रंग-बिरंगे गंदे
और मटमैले कपड़े वाले
लोग दिखे हैं
जो रिक्शे चला रहे हैं
जो चाय बना रहे हैं
और गुब्बारे बेच रहे हैं
तभी तो हौंसला बना है मुझमें
भीड़ की विपरीत दिशा में चलने का।
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