Monday, January 26, 2026

राजेन्द्र राजन जी की तेरह कवितायें : यह कौन-सी जगह है

 1. कोतवाल के कुत्ते

यूँ तो कोतवाल के घर और दफ्तर
कुल मिलाकर आठ-दस कुत्ते ही रहे होंगे
पर कोतवाल के कुत्ते कहे जाने वाले
कुत्तों की कोई गिनती नहीं थी
वे शहर भर में फैले हुए थे ।

शहर में और भी कुत्ते थे
पर उनमें और कोतवाल के कुत्तों में
एक बड़ा फर्क था
अन्य कुत्ते
जहॉं सिर्फ कुत्ता-स्वभाव के कारण भौंकते थे
वहीं कोतवाल के कुत्ते
स्वभावगत विवशता के अलावा
एक लक्ष्य से भी प्रेरित थे
वे कोतवाल की नापसंद का खयाल करके भी
भौंकते थे और शायद इसीलिए
कोतवाल के कुत्ते कहे जाते थे ।

वे कोतवाल की भाषा तो नहीं समझते थे
लेकिन कोतवाल के इशारों और हाव-भाव से
उसकी पसंद-नापसंद जान गये थे
जैसे एक बार धरने पर बैठे लोगों पर
कोतवाल ने घोड़े दौड़ा दिये थे
जुलूस में जा रहे लोगों पर
लाठियॉं चलवा दी थीं
और एक आदमी को बुरी तरह हण्टर से पीटा था
जो लाठीचार्ज के बाद
उससे जोर-जोर से बहस कर रहा था
तब से कहीं भी कोई धरना होता
कोई जुलूस जा रहा होता
कोई खुलकर बोल रहा होता
या सवाल पूछ रहा होता
कोतवाल के कुत्ते भौंकना शुरू कर देते
पूरी ताकत से भौंकते
और लगातार भौंक-भौंक कर
सारे वातावरण को खौफजदा कर देते ।

इस तरह
निषेधाज्ञा लगी हो या नहीं
धरना जुलूस सभा विरोध प्रदर्शन वगैरह
काफी कम होने लगे
कोतवाल के कुत्तों के डर से
यहॉं तक कि सड़क के किनारे
चाय की रेहड़ी पर होने वाली चर्चाएं भी
धीरे-धीरे बन्द होती गयीं
क्योंकि लोगों को डर लगा रहता
कहीं कोतवाल के कुत्ते न आ जाएं ।

कोतवाल के कुत्ते
चर्चाओं और बहसों की भाषा नहीं समझते थे
लेकिन वे यह ताड़ जाते थे
कि धरने पर बैठे लोग भी
इसी तरह के कपड़े पहने थे
जुलूस में शामिल लोग भी
कंधे पर इसी तरह के झोले लटकाए थे
और कइयों की तो शक्लें भी वही थीं
जिन पर कोतवाल का गुस्सा फूटा था ।

कोतवाल के कुत्तों के कारण
शहर में पत्रकारों की भी शामत आ गयी थी
हुआ यों कि एक बार
एक संवाददाता हाथ में कलम लिये
शहर की कानून व्यवस्था के बारे में
जैसे ही कुछ पूछने के लिए खड़ा हुआ
कोतवाल साहब उस पर झल्ला पड़े
तभी से कुत्ते समझ गये
जिसके हाथ में कलम होती है
या कोई भी जो सवाल करना चाहता है
उसे साहब पसंद नहीं करते
और वह इसी लायक है कि उस पर
जोर-जोर से भौंका जाए
उसका पीछा किया जाए ।

जिस तरह कोतवाल
कपड़े से ही समझ जाता था
कि किसे सलाम ठोंकना है और
किसकी पिटाई करनी है
किसे संदिग्ध सूची में रखना है
उसी तरह कोतवाल के कुत्ते भी
पोशाक से ही समझ जाते थे
कि किस आदमी का पीछा करना है
किसके आगे दुम हिलाना है ।

लकदक कपड़े पहने जो लोग
बड़ी-बड़ी गाड़ियों में आते
उन्हें कोतवाल साहब गेट तक छोड़ने जाते
मेहमान जब तक चले नहीं जाते थे तब तक
कोतवाल के कुछ कुत्ते गेट पर
और कुछ गेट के बाहर खड़े
दुम हिलाते रहते थे ।

दूसरी तरफ कोतवाल साहब
जिस तरह के लोगों को पसंद नहीं करते थे
वे अपने कपड़े की देखते
और हर वक्त डरे रहते थे
कि कहीं कोतवाल के कुत्ते न घेर लें ।

कोतवाल के कुत्ते
शहर के बाकी कुत्तों से
बहुत ज्यादा सक्रिय और जोशीले थे
सब तरफ नजर रखते थे
उनमें से कोई अकेला भी
किसी को संदिग्ध कपड़ों में देख लेता
तो फौरन भौंकना शुरू कर देता
इस उम्मीद में कि वह जल्द ही
संख्याबल जुटा लेगा
और होता भी यही था
संख्याबल आसानी से जुट जाता
फिर तो भौंकना आतंक का पर्याय हो जाता
जा रहा आदमी जल्दी ही पाता कि
कोतवाल के कुत्ते उसके पीछे पड़ गये हैं
अगर वह काटे जाने से बच जाता
तब भी यही निश्चय करता
कि आइंदा इधर नहीं आएगा ।

लेकिन समस्या यह थी
कि किस रास्ते जाओ किस रास्ते नहीं
कोतवाल के कुत्ते हर कहीं मिल जाते थे
कोई रास्ता निरापद नहीं बचा था
सारा शहर आतंकित रहने लगा था
हालत यह हो गयी थी कि शहर के लोग
कोतवाल से ज्यादा
कोतवाल के कुत्तों से डरते थे ।

कोतवाल के कुछ करीबी भी यह मानते थे
कि कोतवाल के कुत्तों का आतंक
बहुत बढ़ गया है
लेकिन वह इस बात को कहते नहीं थे
इस डर से कि पता नहीं
कोतवाल साहब क्या सोचेंगे
कहीं इसे लोगों की शिकायत की
पुष्टि करना न मान लिया जाए
या शायद वे जानते थे
कि कहने से कोई फायदा नहीं
कोतवाल साहब एक कान से सुनकर
दूसरे कान से निकाल देंगे
या कहेंगे आप अपना काम कीजिए
कुत्तों को अपना काम करने दीजिए ।

शहर भर में
कोतवाल के इतने कुत्ते क्यों थे
इस बारे में अलग-अलग अनुमान थे
कोई कहता कि इन कुत्तों को
कोतवाल साहब की तरफ से
नियमित रूप से कुछ खाने को मिलता था
कोई कहता कि सामान्य कुत्तों को ही प्रशिक्षण देकर
इस तरह का बना दिया जाता था ।

बहरहाल, तमाम आतंक मचाने के बावजूद
ऐसा भी मत समझिए कि कोतवाल के कुत्तों से
न डरने वाला कोई बचा नहीं था
जैसे कि एक दिन एक हाथी
ऐन उधर से ही गुजरा जिधर
कोतवाल के बहुत से कुत्ते जमा थे
हाथी को देखते ही भौं-भौं शुरू हो गयी
कुत्तों को लग रहा था कि हाथी डरकर वापस
उधर ही चला जाएगा जिधर से आया था
हाथी लेकिन पीछे नहीं मुड़ा
सूंड़ हिलाता आगे ही बढ़ता रहा
जब वह नजदीक आ गया तो कुत्ते ही दुबकने लगे
हालांकि कुत्तों का भौंकना जारी रहा
मगर वे काफी पीछे हट गए थे ।

जब हाथी सूॅंड़ हिलाता शान से चला गया
तब कुत्तों में उसे भगा देने का श्रेय लेने की
होड़ मच गयी
और चंद मिनट पहले जो हाथी पर भौंक रहे थे
वे अब एक-दूसरे पर भौंकने लगे
कुछ देर बाद
एक दूसरा हाथी आता हुआ दिखाई दिया
अब फिर से सारे कुत्ते
एक होकर हाथी पर भौंकने लगे
फिर वही हुआ जो पहले हुआ था
हाथी नजदीक आया तो कुत्ते पीछे दुबक गये
और यह दूसरा हाथी भी बेपरवाह
अपने रास्ते चला गया
हाथी को जैसे इस बात से कोई मतलब ही न हो
कि ये कहां के या किसके कुत्ते हैं ।

इस बेपरवाही और शान के कारण
कोतवाल भी मन-ही-मन
अपने कुत्तों से ज्यादा
हाथी की कद्र करता था
अलबत्ता यह बात उसके कुत्तों को मालूम नहीं थी ।

कोतवाल अपनी सेहत का खयाल रखता
और काफी समय से
उसे रोज सुबह टहलने की आदत थी
टहलते वक्त वह कई बार अपनी चाल धीमी कर देता
और यह सोच कर खुश होता कि वह मस्ती से
हाथी की तरह चल रहा है
उसके चाल धीमी करते ही आगे-आगे चल रहे
उसके कुत्ते पीछे मुड़कर देखने लगते
तब वह आश्वासन देने के अंदाज में कहता
'डोंट वरी आई फालो यू'

हालॉंकि पार्क में कुत्तों को लाना मना था
लेकिन यह नियम कोतवाल पर लागू नहीं होता था
वह रोज कुत्तों के काफिले के साथ आता
शायद यह आदत के साथ-साथ
रौब गॉंठने का उसका एक तरीका भी था
लेकिन इसके चलते कई लोगों ने
अपने टहलने का वक्त बदल दिया था
कई शाम को टहलने लगे थे
कइयों ने आना ही बंद कर दिया था ।

इस तरह होते-होते यह हुआ
कि कोतवाल जब पार्क में होता
तब आदमी कम कुत्ते ज्यादा नजर आते ।

और एक दिन ऐसा हुआ कि कोतवाल को लगा
पार्क में इस छोर से उस छोर तककोई आदमी नहीं दीख रहा
सारे पार्क में हर तरफ केवल कुत्ते घूम रहे हैं
कोई कुत्ता उसकी तरफ मुंह करके भौंक नहीं रहा था
बल्कि जो उसकी तरफ देखता वह चुपचापदुम हिलाने लगता
कई उसके आगे आगे चल रहे थे
मानो रास्ता साफ करते जा रहे हों
फिर भी पहली बार कोतवाल को कुत्तों से डर लगा
उसे समझ नहीं आ रहा था
कि वह कहॉं चला आया है
जहॉं दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं
घबराहट में वह पार्क से बाहर निकल आया
पार्क के बाहर की सड़क पर भी कुत्ते ही कुत्ते थे
डर के मारे वह एक दूसरी सड़क की तरफ मुड़ा
उधर भी दूर तक
सिर्फ कुत्ते दीख रहे थे
अब वह जाए तो किधर जाए!

उसकी सॉंस फूल रही थी
वह पसीने से लथपथ हो चला था
कुत्तों से बचने के लिए
हार मानकर वह एक पेड़ पर चढ़ने लगा
तभी उसकी नींद टूट गयी
अगले ही पल उसे अजान की आवाज सुनाई दी
उसने पसीना पोंछा और राहत की सॉंस ली।

2.आसान और मुश्किल

कितना आसान है
किसी और मुल्क में हो रहे
जुल्म के खिलाफ बोलना
इस पर वे भी बोलते हैं
जो अपने मुल्क में तमाम सितम
चुपचाप देखते रहते हैं
कभी मुंह नही खोलते ।

कितना आसान है
दूसरों को उदारता का पाठ पढ़ाना
इस धर्म के कट्टरपंथी भी
करते रहते हैं
उस धर्म के
कट्टरपंथ की निंदा ।

कितना आसान है
महापुरुषों की तस्वीरों और प्रतिमाओं पर
फूल चढ़ाकर
अपनी जिम्मेदारियों से बचे रहना
हमारे समय के निठल्ले और कायर भी
गाते हैं पुरखों की वीरता के गीत
सुनाते हैं क्रांतिकारियों के किस्से ।

कितना आसान है
अतीत के अत्याचारियों से लड़ना
हमारे समय के अत्याचारी भी
करते हैं अतीत के अत्याचारों की चर्चा ।

कितना मुश्किल है
अपने गिरेबां में झांकना
खुद को कसौटी पर कसना ।

3. न्याय

भेड़िये की शिकायत पर
मेमने के ख़िलाफ़
दर्ज कर ली गयी एफआईआर

भेड़िये को जान से मारने के इरादे से
हमला करने का आरोप है
मेमने के ख़िलाफ़

मेमने को
कर लिया गया गिरफ़्तार

इस गिरफ़्तारी पर
तमाम मेमने खूब मिमियाये
फिर उन्हें चुप करने की खातिर
एक समिति बनायी गयी
और उसे कहा गया
कि जल्दी से सच्चाई का पता लगाये

जॉंच की रिपोर्ट बताती है
मेमने के शरीर पर
दॉंत और नाखून के गहरे निशान हैं
मगर रिपोर्ट अन्त में कहती है
भेड़िये ने जो कुछ किया
आत्मरक्षा में किया

इस जॉंच रिपोर्ट के बाद
तमाम भेड़िये गुस्से में हैं
और गुर्रा-गुर्रा कर
मॉंग कर रहे हैं
कि हमलावर मेमने को
ऐसी सख़्त सज़ा दी जाए
कि न्याय के इतिहास में
मिसाल बन जाए

फ़ैसला आना बाकी है
मेमना कॉंप रहा है
भेड़िया मुस्कुरा रहा है ।

4. इस घड़ी में

इतिहास तुम जब चाहो तब पढ़ सकते हो
लेकिन जिंदगी में कभी-कभार ऐसी घड़ी आती है
जब तुम इतिहास बनते हुए देखते हो
एकदम करीब से

यह वह घड़ी होती है
जब सच सतह के नीचे नहीं रहता
दूर या किसी चीज की ओट में नहीं रहता
सबके ऐन सामने आकर खड़ा हो जाता है
ताकि वे लोग भी देख लें
जिन्हें कुछ भी साफ-साफ नहीं दिखता

यह वह घड़ी होती है
जब पीड़ा का पर्वत पिघलकर बहने लगता है
जब एक सोया हुआ सपना सैलाब बनकर
सड़कों पर उमड़ आता है
जब उलटे पांव भागता रहा आदमी
संगीनों के साये में तनकर खड़ा हो जाता है

लेकिन यह वह घड़ी भी होती है
जब भरमाने और बहलाने का खेल
और तेज हो जाता है
जब साजिशों की बुनावट और महीन हो जाती है
जन अन्याय न्याय की पोशाक पहने दिखता है

जब लालच और जोर से अपना जाल फेंकता है
जब डराने के नये-नये हथियार आजमाये जाते हैं
जब शासन की शान में कसीदे पढ़नेवाले
और जोर-जोर से गाते हैं
जब आँख मूँदे रखने के फायदे बताए जाते हैं
जब मुँह न खोलने का भी इनाम मिलता है

चाहो तो तुम भी अपनी कीमत लगा सकते हो
दरबारियों के सुर में सुर मिलाकर
या अपना मुँह बन्द  रखकर

या चाहो तो जोखिम उठाकर
एक नए बनते हुए इतिहास की आँखों में झाँक सकते हो
उससे हाथ मिला सकते हो
उसके साथ चल सकते हो
जितनी दूर चाहो

इस घड़ी में
जब इतिहास बन रहा होता है
कसौटी काफी कठिन हो जाती है
और हरेक से पूछती है
किस ओर हो तुम ।

5..सच बोलो लेकिन . . . .

खुद की खैरियत चाहते हुए
सच बोलना चाहते हो तो सँभलकर बोलो
दो टूक नहीं
किसी का नाम लेकर नहीं
सुराग़ देकर नहीं
शिनाख़्त करके नहीं
परदा हटा करके नहीं
थोड़ा ढँककर बोलो
या इतना घुमा-फिराकर बोलो
कि पता न चले सच क्या है।

सच बोलो लेकिन जोर से नहीं
इतना आहिस्ता बोलो
कि किसी को सुनाई न दे
अच्छा होगा कि अकेले में
सिर्फ अपने आप से बोलो।

सच बोलो लेकिन
कोई निरापद विषय छेड़ो
फूल-पत्ती मौसम सुबह की सैर
खान-पान की रुचियों
या पोशाक को लेकर अपनी पसन्द
या ऐसी ही किसी और चीज की बात करो
जो देखा नहीं जा रहा है उसके बारे में
मत बोलो।

सच बोलो लेकिन
किसी गुजरे हुए जमाने के बारे में बोलो
मौजूदा वक़्त के बारे में नहीं
जैसा चल रहा है उसके बारे में नहीं
वरना रंग में भंग पड़ जाएगा
और खलल डालनेवाले को
वे बख्शेंगे नहीं।

सच बोलो लेकिन
कबीर की तरह नहीं
गांधी की तरह नहीं
सुकरात की तरह नहीं
उस बच्चे की तरह नहीं
जो बोल पड़ा था राजा तो नंगा है।

सच बोलो लेकिन ख्याल रहे
वह कड़वा न हो
मीठा हो
आम की तरह
बोलो तो लगे कि तुम आम का स्वाद
या आम खाने की विधियां बता रहे हो।

सच बोलो लेकिन
परिणाम की परवाह किए बिना नहीं
सच बोलो लेकिन ध्यान रहे
उन लोगों पर कोई आँच  न आए
जिनके पास कानून की ताकत है
जिनके पास पैसे की ताकत है
जिनके पास धर्म की सत्ता है
जिनके पास न्याय की सत्ता है
जिनके पास प्रचार की ताकत है
जिनके पास भीड़ की ताकत है ।

सच बोलो लेकिन इन्हें चुभनेवाला न हो
वरना ये किसी भी हद तक जाकर
तुम्हारा मुंह बंद कर देंगे।

6. इस बुरे वक्त में

दुनिया-भर की दूरबीनों खुफिया-कैमरों और रडारों
पाताल तक खंगाल डालनेवाली पनडुब्बियों
आसमान को कंपा देनेवाले लड़ाकू विमानों
अंतरिक्ष तक मार कर सकने वाली मिसाइलों
सुरक्षा के और भी तमाम इंतजामों को
मुँह चिढ़ाता हुआ
समन्दरो और पहाड़ों को लाँघता हुआ
सरहदों और संप्रभुताओं पर हंसता हुआ
आ गया है
सबका नया शत्रु
क्या यह अहसास कराने के लिए
कि हमारी सारी तैयारी किसी और मोर्चे पर है
जबकि सबसे ज्यादा खतरा कहीं और है ?

नया शत्रु कितना ताकतवर है
कि देखते-देखते दुख के पहाड़ खड़े कर देता है
तरक्कियों को तबाह कर देता है
शहरों को वीरान कर देता है
वह इतना ताकतवर है फिर भी कितना छोटा
कि नजर नहीं आता
जैसे कोई अदृश्य बर्बरता हो जो सब जगह टूट पड़ी है
एक विषाणु विचार की तरह सूक्ष्म
फैल जाता है दुनिया के इस कोने से उस कोने तक ।

क्या कुछ विचार भी विषाणुओं की तरह नहीं होते
जो अपने एक शिकार से दूसरे शिकार के जरिये
देखते-देखते सब तरफ़ फैल जाते हैं
जो अपने शिकार को बीमार बना देते हैं
और उसे खौफ के वाहक में बदल देते हैं
क्या तुम ऐसे विचारों की शिनाख्त कर सकते हो?

यह नई लड़ाई बाकी लड़ाइयों से कितनी अलग है
सारी लड़ाइयां हम भीड़ के बूते लड़ने के आदी हैं
पर इस लड़ाई में भीड़ का कोई काम नहीं
उलटे भीड़ खतरा है
इसलिए भीड़  न बनें
बिना भीड़ के भी एकजुटता हो सकती है
थोड़ी दूरी के साथ भी निकटता हो सकती है।

इस बुरे वक्त में जब हम घरों में बंद हैं
तो यह लाचारी एक अवसर भी है
भीड़ से अलग रहकर कुछ गुनने-बुनने का
यह महसूस करने का कि हम भीड़ नहीं हैं
अपने आप से यह पूछने का
कि क्यों हमारा जानना-सोचना-समझना
सब भीड़ पर आश्रित है ?
क्यों हमारे धर्म-दर्शन-अध्यात्म
संस्कृति-सभ्यता-आचार -विचार
राजनीति-जनतंत्र- नियम-कानून
सब भीड़ से बुरी तरह संक्रमित हैं?

हम भीड़ को खुश देखकर खुश होते हैं
भीड़ को क्रोधित देखकर क्रुद्ध
भीड़ ताली बजाती है तो ताली बजाते हैं
गाली देती है तो गाली देते हैं
भीड़ जिधर चलती है उधर चल देते हैं
जिधर मुड़ती है उधर मुड़ जाते हैं
भीड़ भाग खड़ी होती है तो भाग खड़े होते हैं
जैसे भीड़ से अलग हम कुछ न हों ।

ऐसे भीड़मय समय में
कुछ दिन थोड़ा निस्संग रहना एक अवसर है
स्वयं को खोजने का स्वयं को जांचने का
और यह सोचने का
कि क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं
जहां मिलना-जुलना हो और मानवीय एकजुटता हो
मगर जो भीड़तंत्र न हो?

यह बुरा वक्त इस बात का भी मौका है
कि हम प्रतिरोध-क्षमता के महत्त्व को पहचानें
बुरे दौर आएंगे
उनसे हम पार भी पाएंगे
बशर्ते प्रतिरोध की ताकत हो
शरीर में भी
मन में भी
समाज में भी।

7. दूसरा

जो किसी और देश का वासी था
वह पहले से ही दूसरा था
एक दिन वह भी दूसरा हो गया
जो ईश्वर को किसी और नाम से पुकारता था
फिर वह भी दूसरा हो गया
जो कोई और भाषा बोलता था
फिर उसकी भी बारी आ गयी जो उधर का रहने वाला था
एक दिन उसे भी दूसरा बताया गया
जिसके पहनावे और रीति रिवाज अलग थे
एक दिन वह भी दूसरा हो गया
जो तुमसे सहमत नहीं था जिसने सवाल उठाया
और एक दिन वह भी दूसरा मान लिया गया
जिसने चुपचाप खाना खिलाया उसे जो दूसरा था
उसके आंसू पोंछे

इस तरह लोगों को दूसरा बनाते बनाते
तुम सिकुड़ते जाते हो
और एक दिन ऐसी दिशा में मुड़ जाते हो
जो तुम्हें एक अंधी सुरंग में ले जाती है
जहां से निकलने का रास्ता नहीं दीखता।

8.  हवा के खिलाड़ी

वे हवा पर सवार होकर आए थे
और इस आत्मविश्वास से भरे थे
कि जब चाहे तब
हवा पर सवार हो जाएंगे

और वे ऐसा करते भी थे
अकसर हवा पर सवार हो जाते
हवा हवाई बातें करते
और तब किसी की सुनते नहीं थे

जो उनसे ज़मीन पर रहने की गुजारिश करते
उनकी बात
वे हवा में उड़ा देते थे

वे हवा पर सवार होकर आए थे
और हवा का रुख़ पहचानते थे
हवा का रुख़ देखकर चलते थे
वे हवा बाँधना भी जानते थे
और हवा निकालना भी
वे अपने विरोधियों की सारी हवा निकाल चुके थे

हवा के सारे खेल उन्हें आते थे
वे हवा में जहर घोलकर
लोगों के दिमाग में ऐसी हवा भर देते थे
कि मुल्क की हवा बिगड़ती जाती थी
फिर भी उनकी हवा बनी रहती थी।

इतनी हवा बनाने के बाद भी
वे डरे रहते थे
कि किसी दिन उलटी हवा न चल पड़े।

और एक दिन ऐसा ही हुआ
वे हवा हो गये ।

9. शिकार
 
वे अक्सर
नगर चौक में इकट्ठा होते
और प्रशस्ति-गान शुरू कर देते-
 
महाराज परम पराक्रमी हैं
महाराज के कारण
हम सब सुरक्षित हैं
चारों तरफ सुख-शांति है
प्रजा सुखी-संपन्न है
 
महाराज दूरदर्शी हैं
दिग्विजयी हैं
अपूर्व हैं
महान हैं
उनकी महिमा अपरम्पार है
 
महाराज के शत्रुओं का नाश हो
महाराज की जय हो.
 
प्रशस्ति-गायक
महाराज के प्रति
भक्ति की अभिव्यक्ति के
कुछ और भी तरीके इस्तेमाल करते थे
जैसे सवेरा हो गया है ऐसा न कहकर
वे कहते थे महाराज के राज में
सवेरा हो गया है
प्रशस्ति-गायकों में से कोई उत्साह में आकर
यह भी जोड़ देता कि
ऐसा सुंदर सवेरा पहले कभी नहीं हुआ था
और फिर बाकी सब
उसे दोहराने लगते
 
कहीं फूल खिले हों
तो वे समवेत स्वर में कहते
महाराज के राज में फूल खिले हैं
इससे सुंदर फूल पहले कभी नहीं खिले थे
 
प्रशस्ति-गायन कभी-कभी किरकिरा भी हो जाता
जैसे एक बार वे दोहराए जा रहे थे
कि प्रजा सुखी-संपन्न है
प्रजा सुखी-संपन्न है...
तभी एक औरत
दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ
भीख माँगती आ खड़ी हुई
एक बार वे दोहराए जा रहे थे
कि चारों तरफ सुख-शांति है
चारों तरफ सुख-शांति है...
इसी बीच दो राज कर्मचारी खुलेआम
एक बूढ़े आदमी की गाँठ के पैसे ऐंठकर
चलते बने
 
लेकिन प्रशस्ति-गायक
ऐसी घटनाओं को तवज्जोह नहीं देते थे
इसलिए उनके उत्साह में
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था
वे महाराज की पराक्रमी छवि को याद करते
और प्रशस्ति-गायन जारी रखते.
 
महाराज को स्वर्ण-निर्मित पलंग की इच्छा हुई
तो उसके लिए धन जुटाने की खातिर
उन्होंने जन-कल्याण कर लगा दिया
प्रशस्ति-गायकों ने गाना शुरू कर दिया-
महाराज जन-कल्याण के लिए समर्पित हैं
महाराज जन-कल्याण के लिए समर्पित हैं...
 
यह कर लगने के कुछ दिन बाद
प्रजा में असंतोष के लक्षण दिखने लगे
लेकिन प्रशस्ति-गायक इसे महाराज के प्रति
षड्यंत्र का संकेत मानते थे
कहते थे जो महाराज में श्रद्धा नहीं रखते
वे नरक के भागी हैं
अक्षम्य अपराधी हैं
 
कुछ दिन बाद महाराज को
अंतःपुर की साज-सज्जा में
और वृद्धि करने की इच्छा हुई
उन्होंने जन-कल्याण वृद्धि कर लगा दिया
प्रशस्ति-गायक नगर चौक में जमा हुए
और गाना शुरू कर दिया-
महाराज जन-कल्याण में वृद्धि चाहते हैं
निरंतर वृद्धि चाहते हैं
ऐसा कल्याणकारी राजा
पहले कभी नहीं हुआ था
पहले कभी नहीं हुआ था...
 
कुछ दिन बाद
प्रजा में असंतोष के लक्षण
और ज्यादा दिखने लगे
लेकिन मालूम होते हुए भी
महाराज इसकी ज्यादा परवाह नहीं करते थे
वह जानते थे कि एक बार फिर
शिकार पर जाएंगे
शेर को मारकर लाएंगे
फिर उनके पराक्रम की वाहवाही में
असंतोष के सारे लक्षण हवा हो जाएंगे
 
दरअसल जब भी महाराज को
प्रजा में श्रद्धा-भाव कम होता दिखता
वह शिकार पर निकल जाते
दो-चार अत्यंत विश्वास पात्रों
और परम विश्वस्त अंगरक्षकों समेत
साथ में एक बड़ा-सा छकड़ा भी होता
पूरी तरह से ढँका हुआ
जिसे बैल खींचते
 
आगे-आगे महाराज का रथ
पीछे-पीछे छकड़ा
 
महाराज अंधेरा घिरने से पहले लौट आते
वापसी में छकड़ा निरावृत होता
छकड़े में मारा जा चुका शेर दिखता
जिसकी गरदन और पेट में
महाराज के अचूक बाण धंसे होते.
 
मरे हुए शेर से कौन डरता?
सो उत्सुक भीड़ निकट से देखना चाहती
लेकिन अंगरक्षक भाले घुमा-घुमाकर
लोगों को पास आने से रोकते रहते
नगरवासी मारे गए शेर को दूर से देखते
महाराज के साहस और पराक्रम की बातें करते
और प्रशस्ति-गायक
जय-जयकार के नारे लगाते
लोगों को बताते कि हमारे महाराज
छोटे-मोटे जानवर का शिकार नहीं करते
सिर्फ शेर का शिकार करते हैं
और सदा सफल होते हैं
सारा जंगल उनसे थर-थर कांपता है
शेर डर के मारे गुफा में छिप जाता है
 
इस तरह महाराज
कई बार शिकार पर गए
और हर बार
सफल होकर लौटे
प्रजा में उभर रहे असंतोष पर
हर बार उनका पराक्रम भारी पड़ा
फिर वे निश्चिंत होकर राजपाट करने लगे
 
लेकिन एक दिन
किसी ने सोचा न था वैसा हुआ
तीसरे पहर सबको शेर की दहाड़ सुनाई दी
महाराज जब भी शिकार पर जाते
दिन के इसी वक्त जाते थे
प्रशस्ति-गायकों को लग रहा था
शेर खुद चलकर मौत के मुंह में आ गया है
वह नगर की सीमा तक आ गया होगा
महाराज सदल-बल निकलेंगे
और अभी उसका काम तमाम कर देंगे.
 
लेकिन महाराज नहीं निकले
शेर की दहाड़ सुनाई देती रही
पर महाराज किले से बाहर तो क्या
अपने कक्ष से भी बाहर नहीं निकले
न सैनिकों और गुप्तचरों को भेजा
लोग अचम्भित थे
कि महाराज क्यों नहीं निकले
 
प्रशस्ति-गायकों ने लोगों की हैरानी को
यह कहकर शांत किया
कि शेर जान-बूझकर
ऐसे समय दहाड़ रहा था
जब महाराज पूजा में बैठे थे
लेकिन वह बचकर जाएगा कहां?
 
महाराज देर रात तक चिंता में डूबे रहे
फिर इस संकल्प के साथ सोए
कि अगले दिन शेर को मार लाएंगे
लोग मरे हुए शेर को देखेंगे
तालियां बजाएंगे
फिर से उनके पराक्रम के गीत गाएँगे
 
दूसरे दिन महाराज उसी तरह निकले
जैसे वह हर बार शिकार पर जाते थे
साथ में दो-चार अत्यंत विश्वासपात्र दरबारी
परम विश्वस्त अंगरक्षक
आगे-आगे महाराज का रथ
पीछे-पीछे ढँका हुआ छकड़ा
 
नगर चौक में पहले से जमा
प्रशस्ति-गायक आश्वस्त थे
कि आज एक बार फिर
गौरवान्वित होने का दिन है
और इसी खुशी और उत्साह में
वे किए जा रहे थे लगातार
महाराज की जय-जयकार.
 
लेकिन नगर की सीमा पार करना तो दूर
महाराज अभी
नगर चौक पहुंचने ही वाले थे
कि शेर की दहाड़ सुनाई देने लगी
 
प्रशस्ति-गायकों को लगा
दहाड़ सुनकर महाराज को प्रसन्नता हुई होगी
शिकार कहीं पास में है
और जल्दी ही मारा जाएगा
 
मगर महाराज के चेहरे पर
हवाइयाँ उड़ रही थीं
वह नगर चौक पर पहुंचे ही थे
कि शेर की दहाड़
बार-बार सुनाई देने लगी.
 
महाराज समझ नहीं पा रहे थे क्या करें!
सहसा उनके इशारे से
रथ रुक गया
 
दहाड़ तेज और तेज
और तेज होती जा रही थी
लग रहा था
जैसे वह हवा में भर गयी है
आसमान में छा गयी है
जमीन से निकल रही है
हर तरफ से हरेक रास्ते से
हरेक घर से
नगर के कोने-कोने से
दसों दिशाओं से आ रही है
ऐसी दहाड़
पहले कभी
किसी ने नहीं सुनी थी

सुनकर यह भीषण दहाड़
यह भीषण दहाड़ सुनकर
रथ के घोड़े जोर-जोर से
हिनहिनाने लगे
छकड़े में जुते बैल भी
छूट भागने के लिए
छटपटाने लगे
भाग निकलने की उनकी जद्दोजहद में
छकड़ा उलट गया
 
लोगों ने अचम्भे से देखा-
शेर का पुतला
जमीन पर गिरा पड़ा था
उसकी गरदन और पेट में
बाण खुंसे  थे.
 
अंगरक्षक रथ को घेरे खड़े थे
विश्वासपात्र पंखा झल रहे थे
महाराज बेहोश थे
और प्रशस्ति-गायक
खामोश ।

10. इतिहास का ऊँट
  
क्या बोलना है
क्या करना है
किधर चलना है
यह तय करने से पहले
वे यह सुनिश्चित कर लेना चाहते थे
कि इतिहास का ऊंट
किस करवट बैठेगा
 
लेकिन इतिहास का ऊंट
बड़ा अजीब
आखिरकार वह किस करवट बैठेगा
इसका ठीक अंदाजा ही नहीं लगने देता था
 
फिर भी
उसकी हरेक हरकत पर
वे बारीकी से निगाह रखे हुए थे
जैसे वह बिलकुल पास में खड़ा हो
 
लेकिन वह रुका हुआ नहीं था
वह चल रहा था
और चलते-चलते दूर होने लगा
धुंधला दिखने लगा
और लंबा रेगिस्तान पार करते हुए
धीरे-धीरे उनकी नजरों से ओझल हो गया
 
वे अब भी
हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं
चुप्पी साधे हुए
इस इंतजार में
कि इतिहास का ऊँट
फिर इधर आएगा
तब उसका रुख देखकर तय करेंगे
कि क्या बोलना है
क्या करना है
किधर चलना है ।

11.सकारात्मक
जब भी ताली बजाने को कहा जाता है
मैं ताली बजाता हूॅं
जब वे मोमबत्तियॉं जलाने को कहते हैं
मैं छत पर मुॅंडेर पर देहरी पर
मोमबत्तियॉं जलाता हूॅं
जिसे गालियॉं बकने को कहा जाता है
उसे गालियॉं बकता हूॅं
जिसकी जय बोलने को कहा जाता है
उसकी जय बोलता हूॅं

फिर धीरे धीरे खुद को ऐसी दशा में पाता हूॅं
कि जब चिल्ला पड़ना चाहिए
मैं खामोश रह जाता हूॅं
हथियार लहराते जुलूस पर फूल बरसाता हूॅं
इशारा मिलते ही
एक डरे हुए राहगीर का नाम पूछता हूॅं
और उस पर टूट पड़ता हूॅं

हर विषय पर हर मामले में
सरकारी विज्ञप्ति को
अपने हलफिया बयान की तरह पढ़ता हूॅं
जब मुझे तनकर खड़ा होना चाहिए
मैं घुटनों के बल झुक जाता हूॅं
जब बगावत का झंडा उठा लेना चाहिए
मैं आततायियों के गुन गाता हूॅं

मेरे सकारात्मक होने में
कोई कसर रह गयी हो तो बताइए ।

 12. जागरण

वे कहते हैं जागो
मैं अनसुना कर देता हूँ
वे फिर कहते हैं जागो
मैं अब भी खामोश रहता हूँ
पहले वे इक्का-दुक्का आते थे
अब झुंड में आते हैं और जोर से कहते हैं जागो
उनकी आवाज़ और तेज़और तेज़ होती जाती है
वे घेरकर समवेत स्वर में कहते हैं जागो
हम ख़तरे में हैं
हम सब ख़तरे में हैं
ख़तरा बढ़ता जा रहा है

मैं पूछता हूँ
कहाँ है ख़तरा?
कैसा ख़तरा?

वे एक तस्वीर दिखाते हैं
मैं कहता हूँ यह तो
मेरे पड़ोसी का चेहरा है
वे कहते हैं
हैरानी की बात है
ख़तरा इतना निकट होते हुए भी
तुम अभी तक नहीं जागे !

मैं कहता हूँ
मैं पूरी तरह सजग हूँ
अपने पड़ोसी को बचपन से जानता हूँ
उसके बारे में सब कुछ पता है मुझे
देश-दुनिया का ज्ञान है मुझे
दिशाओं का भान है मुझे
मुझे मालूम है कौन-सा रास्ता
किधर ले जाता है

वे कहते हैं नहीं
तुम अभी जागे हुए नहीं हो
तर्क और विचार
खींचते रहते हैं तुम्हें
तुम बहस में उलझ जाते हो
संशय में पड़ जाते हो
इंसानी खून देखकर
सिहर जाते हो
जागो

मैं कहता हूँ
आखिर जागने का क्या मतलब है
कोई है जिसे जागा हुआ कहें ?

वे एक भीड़ की तरफ इशारा करते हैं
मैं भीड़ के करीब जाकर देखता हूँ
सबके हाथ में कोई न कोई हथियार है
किसी-किसी के हाथ में अख़बार भी
सबकी ऑंखों में चिनगारियाँ हैं
चेहरों पर नफ़रत का जोश
मुट्ठियाँ कसी हुई हैं इस अंदाज में
मानो उन्होंने दुश्मन की गर्दन दबोच रखी हो
वे जोर-जोर से नारे लगा रहे हैं
अपने पड़ोसियों के ख़िलाफ़

मित्रों, जागने का यही अर्थ है
तो एक बार फिर मैं कहता हूँ
मैं जागा हुआ नहीं हूँ
न मुझे जागना है ।

13. अनुकूलन

यह कौन है जो आकर मेरे भीतर
पुलिस की तरह बैठ गया है
कभी सख्ती से और कभी
समझाने के अंदाज में कहता है
देखो यह सच बोलने का समय नहीं है
जब इतने लोग ख़ामोश रह सकते हैं
तो तुम भी ख़ामोश रह सकते हो
वरना अंजाम कुछ भी हो सकता है
देखा नहीं!
फैसला सुनाने से पहले उसके साथ क्या हुआ ?

मैं कहता हूँ
पर  मैं अपने दोस्त के कातिल का नाम जानता हूँ
और इसे हलफ़नामे से लेकर
कविता तक में उजागर करना चाहता हूँ

वह कहता है
इसीलिए तुम पर नज़र रखी जा रही है
खैरियत चाहते हो तो मेरी बात मान लो
तुम अपने दिवंगत दोस्त के परिवार के प्रति
सहानुभूति जता सकते हो
लेकिन कातिल का नाम भूल जाओ

उसकी समझाइश का असर होता है
अब फूँक-फूँक कर निकलते हैं मेरे शब्द
और आश्चर्य नहीं होगा अगर किसी दिन
मैं कातिल के गले में माला पहनाते देखा जाऊँ ।