दुनिया का नाटक
नाटक बहुचर्चित था
हॉउसफुल हो गया
नेट पर शाम के शो का
जब टिकट नहीं मिला तो
मन थोड़ा उदास था,
निकला घर से बेमकसद
साईकल-रिक्शे पर बैठा
चावड़ी बाज़ार मेट्रो के लिये
जब चलते हुये रिक्शे पर
बैठे हुये मैंने
नज़र इधर-उधर घुमायी तो
हर पल नया नज़ारा ही दिखा :
कोई कुछ बेच रहा है
कोई कुछ खरीद रहा है
कोई कहीं को जा रहा है
कोई कहीं से आ रहा है
कोई खाली बैठा मस्त है
कोई ज्यादा ही व्यस्त है
कोई रास्ता पूछ रहा है
कोई रास्ता बता रहा है
स्कूल का बस्ता टांगे बच्चा
युवती के कंधे पर लैपटॉप है
रिक्शे पर आदमी को ढोता
ठेले पर लादे माल का बोझा
किसी को इंतजार है सवारी का
कोई अभी भी सो ही रहा है
सुबह का हारा-थका जो है
कोई चाय पी रहा है ढाबे पर
कोई दारू के वास्ते ठेके पर
लंबी लाइन में लगा हुआ है
देखने वाली आंख चाहिये
सुनने वाले कान चाहियें
नाटक चल रहा है सतत
बिना परदे गिरे
सीन ही सीन है हर तरफ
बात करके तो देखो
कहाँ के हो, क्या करते हो,
कब आये दिल्ली,कहाँ रहते हो
और ....सर उठाकर तो देखो
नीले आसमां की ओर
तो बात ही अलग हो जायेगी
कहानी-कविता नज़र आयेगी
लोगों के प्यार की,उनके सपनों की
दर्द की,दुःख की और संघर्ष की
उम्मीदों की और हौंसले की;
बस आधे घंटे में ही
तीन घंटे से ज्यादा की
लाइव रील देख ली
दूर-दर्शन के चक्कर में हम
निकटदर्शन को भूल गये हैं
दुनिया भी एक मंडी ही तो है
नाटक-तमाशा जारी है
उसे नज़रंदाज़ कर
जाते हैं मंडी हाउस
नाटक देखने और जब
टिकट नहीं मिलता उसका
तो हम उदास हो जाते हैं !


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